गड्ढे अच्छे हैं…!!
गड्ढे अच्छे हैं…!!
स्टेट ड्राईव बाय सपन दुबे

“शब्द परिधि”
आजकल बैतूल की सडक़ों में हुए गड्ढों पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है। गड्ढों के अंदर भी कुछ है, नजरें जमाकर देखो और गड्ढों में बेइंतहा भ्रष्टाचार को महसूस करो। हर गड्ढा कुछ कहता है। सिर्फ शायर ही देखता है कहकहों की असलियत, हर किसी के पास ऐसी नजर कहां होगी। सभी गड्ढों को कोस रहें हैं परन्तु गड्ढों के अंदर झांक कर उसकी गहराई नाप नहीं पा रहें हैं। इसे किसी भी तरह से राजनीति से जोडक़र न पढ़ा जाए और न ही समझा जाए और अगर ऐसा करतें हैं तो यह आपके विवेक के उपर निर्भर करता है। खाकसार कि व्यक्तिगत राय है कि बैतूल में अभी तक सभी सियासी दलों में एक भी ऐसा जनप्रतिनिधि नहीं है जिसने इस गंभीर मामले को समझने की कोशिश की है। पूरे कुंए में भांग मिली हुई है, कार्यकर्ता और नेता अपने दल का समर्थन कर विरोधी पक्ष पर सिर्फ आरोपों के चूल्हों पर राजनीति की रोटी सेंक रहें हैं। वादों का डामर है बातों की सडक़ें हैं, गडढ़ों को कल्पनाओं से ही भरना होगा। सडक़ों की तरह ही सरकारी व्यवस्थाओं में भी गड्ढे हो गए हैं। अवाम मौन साधे हुए है उसने कायरता ओढ रखी है और उन्हें पूरी उम्मीद सिर्फ अखबारों से है। उन्हें लगता है कि फकत खबरें छप जाने से इंकलाब आ जाता है। इसी वर्ष पलाश मुच्छल निर्देशित और राजपाल यादव अभिनीत फिल्म ‘काम चालू है’ आई है। फिल्म महाराष्ट्र के छोटे शहर सांगली की कहानी है जो कि मनोज पाटिल की वास्तविक जीवन की कहानी पर आधारित है। नायक जो एक समर्पित पिता है, उसका जीवन तब बिखर जाता है जब उसकी एकमात्र संतान बेटी गुडिय़ा प्रशासनिक लापरवाही के सडक़ के गड्ढे के कारण दुर्घटना में मर जाती हे। नायक अपनी बेटी को एक बहुत बड़ी क्रिकेटर बनाना चाहते था। ऐसी त्रासदियों को दोबारा होने से रोकने के लिए दृढ़ संकल्पित, मनोज अपने दुख को अन्य बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक क्रांतिकारी आंदोलन में बदल देता है। वह गुडिय़ा के लिए न्याय की मांग करता है और अन्य बेटियों को ऐसे ही दुर्भाग्य से बचाने के लिए लड़ता है, उसकी प्रेरणादायक कहानी सामने आती है। फिल्म का सबसे मार्मिक दृश्य है जब नायक पुलिस स्टेशन पहुंचकर कहता है मुझे मेरी बेटी को मारने वाले के विरूद्ध रिपोर्ट लिखना है तब पुलिसवाला कहता है कि कौन है हत्यारा, नायक कहता है गड्ढा। मुझे गड्ढे के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाना है। सडक़ का एक गड्ढा है जो इस परिवार की नियति पूरी तरह बदल देता है। हमारे देश में आतंकवादी हमलों से ज्यादा लोग सडक़ पर हुए गड्ढों से मारे जाते हैं। बताया जाता है कि आज भी मनोज पाटिल अपने खर्चे से सांगली शहर के सडक़ों के गड्ढे भरते हैं। उम्मीद है कि उनका यह भागीरथी प्रयास वहां के जनप्रतिनिधियों को अकसर शर्मासार करता होगा। एक इंजीनियर की व्यक्तिगत राय है कि बैतूल में कोई भी सडक़ टिक ही नहीं सकती है क्योंकि सडक़ बाद में बनाई जाती है निकासी प्रबंधन पहले किया जाता है। गोया कि बैतूल में आम का आचार नहीं आचार से आम बनाने का हास्यापद तकनीक अपनाई जा रही है। इंजीनियर का यह भी मानना है कि सडक़ बनाने के बाद अगल-बगल में पड़ी मिट्टी के ढेर को छोड़ दिया जाता है जिससे मिट्टी दोबारा सडक़ पर आ जाती है। गड्ढे होते रहेंगे तो फिर सडक़ बनेगी फिर सडक़ बनेगी तो फिर से टेंडर और फिर से वही सब कुछ होगा जो आपको अच्छी तरह पता है। इसलिए गड्ढे आपके लिए बुरे हो सकते हैं परन्तु चंद लोगों के लिए अच्छे हैं। फलसफे भी खूब हैं यह गड्ढों को भी नहीं छोड़ते कि सडक़ों के गड्ढों सी हो गई है जिंदगी, एक भरो दूसरा हो जाता है। याद किजिए विद्याधर यादव की कविता कि झूठे हैं, बेईमान हैं, मक्कार हैं, मगर कहलाते सच्चे हैं, क्योंकि ये वो दौर है, जिसमें दाग अच्छे हैं। गोया की गड्ढे तो जेहनी होश उड़ा देते हैं चाहे वो गालों पर पड़े हो या सडक़ों पर। ऐसी सडक़ों के कारण ही लोगों को सडक़ छाप बोला जाता है।
