बचपन के दिन…मेरा स्कूल…दो दूनी चार…!!
बचपन के दिन…!
मेरी पहली पाठशाला…!!
दो दूनी चार..!!!
संस्मरण: गौरी बालापुरे पदम

हर तरफ बिखरे सूखे पत्तों पर कदम पड़ने से निकलने वाली चरमराहट और खड़खड़ाहट से लग रहा था, जैसे कदमों के नीचे से दो दूनी चार.. अ अनार और एक, दो, तीन,चार के स्वर कराहते हुए पाठशाला का दर्द बयां कर रहे है…
नीली फ्रॉक पहनकर आई और बाबूजी के साथ पहली पर जब यहां पहला कदम रखा था तब की कुछ धुंधली सी यादें जहन में है…सफेद बोरी से बने बैग में स्लेट और बारहखड़ी की, एक रुपए वाली पुस्तक लेकर कक्षा पहली में दाखिले के लिए आई-बाबूजी के साथ स्कूल गई थी।जब किसी अच्छे काम के लिए जाना होता तो बाबूजी सफेद धोती नई वाली और कड़क प्रेस वाली कमीज पहनकर जाते थे..आई भी चटक लुगड़ा और माथे पर कुमकुम का गोल बड़ा टीका लगाती,,उनके हाथ हमेशा चूड़ियों से भरे रहते..जिस दिन एडमिशन कराया था मुझे सहज उनकी वेशभूषा भी याद आ गई। बड़ी दीदी को स्कूल जाता देख मैंने कभी जिद की थी या नहीं मुझे तो यह भी याद नहीं है..पर हां यह अच्छे से याद है, जब स्कूल में दाखिला लिया था तब बड़ोनिया बहनजी ने कहा था सर के ऊपर से हाथ से कान छूकर बताना ज़रा…हाथ ने कान छुआ और मुझे एक क्लास में बिठाने के लिए स्कूल के काका के साथ भेज दिया गया। जिस कक्षा में भेजा वहां चाचाजी की बेटी प्रतिभा को देखते ही मैं उछल गई।अपने सामने थोड़ी सी जगह बनाते हुए उसने दो इशारे किए..पहला इशारा था पास आने का दूसरा जमीन पर हाथ ठोकते हुए सामने टाटपट्टी पर बैठने का..बचपन से ही वह बोल सुन नही पाती थी, इसलिए इशारे ही उसके और हम सभी के बीच संवाद का माध्यम थे। पहली कक्षा से पांचवी तक बड़ोनिया बहनजी ही क्लास टीचर रही..इसी स्कूल में कभी मैंने मेरा विद्यालय और मेरी पाठशाला, खेल का मैदान, मेरी क्लास टीचर जैसे विषय पर निबंध भी लिखा। प्रायमरी स्कूल में पढ़ने दौरान हमेशा चंद कदम की दूरी पर स्थित पुत्री शाला स्कूल जाने का मन रहता था,,वह इसलिए भी कि यह स्कूल थोड़ा ऊंचाई पर था और बारिश में यहां कीचड़ नही होता था..चंद सीढ़िया चढ़कर स्कूल में प्रवेश करते थे..खैर यहां पढ़ने का मौका कम ही मिला।मुझे बचपन से ही अपने सभी टीचर्स का भरपूर दुलार मिला..पहली कक्षा में जब पहली बार बैठी तो कक्षा में लगा ब्लैकबोर्ड,कवेलु वाली छत, बारहखड़ी,गिनती, पहाड़े लिखी दीवारे जैसे मन मस्तिष्क में घर कर गई थी।यह कक्ष स्टाफ रूम से दूसरे नंबर पर था इसलिए शोर मचाने पर हमेशा सख्ती रहती थी…यह वही स्कूल है जहां 5वी कक्षा में 26 जनवरी पर एक कविता सुनाने पर मुझे पारले जी का पैकेट पुरुस्कार के रूप में मिला था..यहां की बाल सभाएं..सहेलियों के साथ बाल पकड़ लड़ाइयां, धूप – छांव, चंगा- अष्टा, लंगड़ी, नदी -पहाड़, सेम- पिंच, चार चिट जैसे खेल..पवार मैडम का रूल और हिंदी पर उनकी जबरदस्त पकड़…सब 7 मई को मेरी आंखो के सामने से रील की तरह गुजर रहा था…लोकसभा चुनाव के कवरेज के लिए उत्सुकतावश मैं, बैतूल बाजार पहुंची थी…सहसा अपनी पहली कक्षा में कदम पड़ते ही कवेलु की जगह टूटी छत से झांकते नीले आसमान और गुलमोहर के मुस्कुराते फूल देखकर आंखे नम हो गई…मेरी यह पाठशाला खंडहर होकर भी इतनी खूबसूरत है, तो जरा सोचिए जब यह बच्चो की चहचहाट से आबाद थी, तब यह कितनी खुशनुमा रही होगी। स्कूल के प्रवेश द्वार से मैदान,कक्षाएं, लाइब्रेरी, स्टाफ रूम, घंटी लटकाने वाली मयाल, मंच,बरामदा, और हरे भरे पेड़ सब मैं एक नजर में देखती रह गई..कुछ कमरे धराशायी हो चुके है, कुछ की दीवारें बची है, कुछ की छत गायब है, तो कुछेक कक्ष के दरवाजे पर लटके ताले विरासत के खजाने को मुंह चिढ़ाते नज़र आ रहे है… हर तरफ बिखरे सूखे पत्तों पर कदम पड़ने से निकलने वाली चरमराहट और खड़खड़ाहट से लग रहा था, जैसे कदमों के नीचे से दो दूनी चार.. अ अनार और एक, दो, तीन,चार के स्वर कराहते हुए पाठशाला का दर्द बयां कर रहे है।मेरे कदम, हर कदम पर ठिठक रहे थे…हर कदम पर बस यही लग रहा था.. कि बस टन टन टन टन स्कूल की घंटी बजे और कक्षाओं से पहले स्कूल के बाहर कौन जायेगा, यह होड़ फिर से लग जाए…स्कूल का नाम बदला, फिर नाम बदला और फिर समेकित में मर्ज होकर बाद में एक शाला एक परिसर का हिस्सा बन गए यहां के बच्चे..सुना है जब स्कूल को मर्ज किया यहां की दर्ज संख्या दहाई में ही रह गई थी…यह सरकारी स्कूल तो आज भी अपनी बची दीवारों, खेल के मैदान के साथ अपने होने का सबूत दे रहा है.. पर इस विरासत की वीरानगी पीड़ादायी है। इस स्कूल ने न जाने कितने बच्चो की नीव को मजबूत बनाया, पर आज यही अपनी नींव को तलाश रहा है…काश वीरान होते स्कूल, मैदान बनते कक्ष और अस्तित्व खो चुकी पाठशाला के मौन को कोई जिम्मेदार सुन ले और ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक नगरी बैतूल बाजार की इस भूमि पर एक लाइब्रेरी, एक म्यूजियम,एक ओपन ऑडिटोरियम और एक पार्क बना दे..ताकि खंडहर बन रहे स्कूल की जगह आबाद देखकर ही सही हम जैसे लोग यह कह सके… देखो ये जो लाइब्रेरी है न, वहा हमारी कक्षा होती थी, यह ओपन ऑडिटोरियम हमारा खेल का मैदान था…और ये जो नीलगिरी और गुलमोहर के पेड़ है…ये साक्षी है बदलाव के,,विकास के,,आने वाली पीढ़ियों को यही तो अतीत की कहानियां सुनाएंगे। बशर्ते यह..इसी तरह हरे भरे और गुलजार रहे…बस चलते चलते इसके मुहाने पर एक फोटो क्लिक की और भारी मन से लौट आई…!!

