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आदिवासी कन्या आश्रम से 24 घंटे गायब रही 12 वर्ष की तीन छात्राएं

➡️आखिर क्या जरुरी सामान खरीदने छात्राओं को जाना पड़ा 20 किमी दूर

➡️देसली कन्या आश्रम में छात्राओं की सुरक्षा पर सवाल, शाम होते ही नशे में रहती है अधीक्षिका

परिधि एक्सक्लुसिव बैतूल

✍️गौरी बालापुरे पदम

जिले के छात्रावासों के हाल से पूरा बैतूल वाकिफ है। उच्च अधिकारियों एवं जनप्रतिनधियों को तो छात्रावास के संचालन में कभी कोई खामियां नजर ही नहीं आती, इसके पीछे वजह अपने चहेतों को मलाईदार पदों से मुक्त करने की मंशा जगजाहिर है। यहीं वजह है कि जब किसी छात्रावास में अधीक्षक की लापरवाही सामने आती है तो बचाव के लिए जनप्रतिनिधि के दरवाजे खुले रहते है। बात छात्राओं की सुरक्षा की हो या छात्रावासों में अव्यवस्थाओं की लीपापोती आम बात है। ताजा मामला भीमपुर विकासखंड के अंतर्गत देसली कन्या आश्रम का है जहां से तीन छात्राएं करीब 24 घंटे गायब रही। परिजन बालिकाओं को लेकर परेशान रहे और सोमवार सुबह भी उन्हें ढूंढ रहे थे। अधीक्षिका का कहना है कि बालिकाएं लौट आई है लेकिन यह कितना सच है यह फिलहाल जानकारी में नहीं है। क्योंकि अधीक्षिका द्वारा इस खबर को प्रसारित न करने के लिए समझने-और मिलने तक का ऑफर दिया है। गौरतलब है कि देसली छात्रावास की अधीक्षिका पिछले 15 वर्षों से बतौर अधीक्षक ही विभिन्न छात्रावासों में पदस्थ रहीं है। देसली कन्या आश्रम में वह विगत दो वर्षों से पदस्थ है। बहरहाल बालिकाओं की सुरक्षा को लेकर अधीक्षिका कितनी संवेदनशील है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अधीक्षिका ने ही तीनों छात्राओं को 20 किमी दूर दामजीपुरा भेज दिया था।
24 घंटे गायब रही छात्राएं तो मचा हडक़म्प
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार कन्या आश्रम में निवासरत ग्राम महतपुर, धावड़ा रैय्यत और चिरा की तीन बालिकाएं रविवार सुबह से छात्रावास छोडक़र गई थी। ये तीनों ही छात्राएं कक्षा 6वीं में अध्ययनरत है। इस लिहाज से उनकी उम्र करीब 11 से 12 वर्ष है। तीनों छात्राएं किसी जरुरी काम से रविवार को 20 किमी दूर दामजीपुरा गई थी जो 24 घंटे तक वापस नहीं लौटी। छात्रावास में बालिकाओं के न होने की सूचना जब परिजनों को मिली तो सभी अपनी बेटियों को ढूंढने निकल पड़े। इधर कन्या आश्रम की अधीक्षिका का कहना है कि परिजनों के कहने पर ही बालिकाओं को बाहर जाने की अनुमति दी गई थी।
कन्या आश्रम में उड़ रही नियमों की धज्जियां
वैसे तो प्रत्येक आश्रम/छात्रावास में एक विजिटर रजिस्टर होता है। यदि बालक या बालिका के परिजन छात्रावास में आते है तो उनकी एंट्री, आने-जाने का समय दर्ज किया जाता है, बच्चों से कौन मिल सकता है यह नाम भी तय होते है। ऐसे में देसली आश्रम से महज 11-12 साल की बालिकाओं को सामान खरीदने जाने की अनुमति अधीक्षिका द्वारा दी जाती है, साथ ही उन्हें बिना किसी जिम्मेदार व्यक्ति के बाहर भेज भी दिया जाता है। अधीक्षिका की माने तो बालिकाएं बस न मिलने के कारण दामजीपुरा में किसी छात्रा की नानी के घर रुक गई थी, जो आज सोमवार को छात्रावास लौट चुकी है, ऐसे में सवाल यह है कि बालिकाएं यदि सुरक्षित है तो परिजन उन्हें ढूंढ क्यों रहे है, क्या सच में बालिकाएं आश्रम में लौट आई है यह भी संदेहास्पद है।
क्या नशे में रहती है अधीक्षिका?
सूत्र बताते है कि कन्या आश्रम देसली की अधीक्षिका सुशीला गुलबाके आश्रम में उपर के कक्ष में रहती है, शाम को यह अधीक्षिका शराब का सेवन भी करती है जिसकी वजह से नशे में रहती है, यदि यह सच है तो जिम्मेदारों को बालिकाओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर कदम उठाने चाहिए। अधीक्षिका का नियंत्रण आश्रम में नहीं है यह बाते भी सामने आ रही है। गौरतलब है कि उक्त अधीक्षिका पूर्व में करीब 7 साल रतनपुर छात्रावास एवं करीब 6 साल तक चूनालोमा प्रभूढाना छात्रावास में पदस्थ रह चुकी है, विगत दो वर्ष से देसली में पदस्थ है। अधीक्षक बने रहने का मोह कम ही नहीं हो रहा है।
कुछ ऐसे ही हाल दामजीपुरा छात्रावासो के भी
प्राप्त जानकारी के अनुसार कस्तूबा गांधी कन्या छात्रावास की हालत भी खराब है। यहां अधीक्षिका रुपवंती आठवा दो छात्रावास अकेले संभाल रही है। अधीक्षिका मूलत: टिटवी की रहने वाली है। दामजीपुरा में वह किराए के मकान में निवासरत है। दामजीपुरा के ग्रामीणों ने चर्चा के दौरान बताया कि रुपवंती आठवा रात होते ही किराए के मकान में आ जाती है या फिर टिटवी चली जाती है। इससे स्पष्ट है कि छात्रावास की बालिकाओं की सुरक्षा को लेकर यह अधीक्षिका संवेदनशील नहीं है। गौरतलब है कि अधीक्षिका की पारिवारिक पृष्ठभूमि भी चौकाने वाली है, तीन सौतन और 16 बच्चों वाले परिवार से जुड़ी अधीक्षिका के पति क्षेत्रीय विधायक महेन्द्र सिंह चौहान के खास है। गौरतलब है कि जब अधीक्षिका रुपवंती छात्रावासों में नहीं होती है तो बालिकाओं की जिम्मेदारी चौकीदार लाल सिंह के भरोसे रहती है। जानकारी के अनुसार यह चौकीदार नशे का भी आदि है। इसी तरह आदिवासी कन्या आश्रम में चौकीदार रूपलाल काकोडिय़ा पदस्थ है। रात के समय यही चौकीदार छात्रावास की चौकसी करते है। गौरतलब है कि माता-पिता बच्चों को सुरक्षित शिक्षा के लिए छात्रावासों में अधीक्षिकों के भरोसे छोडक़र जाते है। बीते दिनों भीमपुर प्रवास के दौरान इस छात्रावास एवं अधीक्षिका की लापरवाहियों को लेकर परिधि के प्रतिनिधि ने सहायक आयुक्त वत्सला शिवहरे से सवाल भी किया था, कम समय में ही इस छात्रावास और अधीक्षिका के प्रति सहायक आयुक्त की आत्मीयता इस कदर थी कि उन्होंने जवाब में कहा कि आदिवासी आश्रम तो अच्छे से संभाल रही है, यदि दूसरे में दिक्कत है तो वह जाने। मतलब साफ है जनप्रतिनिधि नाराज नहीं होने चाहिए बच्चों का भविष्य भले ही दांव पर लग जाए। सूत्रों के मुताबिक कई शिकायतें मिलने के बाद भी अधीक्षिका रुपवंती आठवा को न हटाने के पीछे की वजह क्षेत्रीय विधायक ही है। यदि इसी तरह जनप्रतिनिधि गलतियों पर परदा डालते रहें तो शिक्षा को संजीवनी भला कैसे मिल पाएगी?

इनका कहना…
आपके माध्यम से यह जानकारी मिली है, मैं इस संबंध में पता करता हूं क्या इश्यू है।
डॉ सौरभ संजय सोनवणे, कलेक्टर बैतूल
छात्राएं आश्रम में ही है, कुछ जरुरी सामान लेने दामजीपुरा गई थी, बस न मिलने के कारण रात में वहीं रूक गई थी।
सुशीला गुलबाके, अधीक्षिका

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