“काकू”
शब्द श्रद्धांजलि
“काकू”
शब्द श्रद्धांजलि
गुंजन खंडेलवाल, बैतूल
मेरी प्रिय लेखिका से काकू बनने की यात्रा कब शुरू हुई जानने के लिए फ्लैशबैक में जाना होगा। उस युग में आखिर बरसों पहले की बात है ना ।हम भाई बहन खूब पत्र पत्रिकाएं पढ़ते थे।

धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान के लिए छीना झपटी होती थी।मन्नू भंडारी,मंजुल भगत,मृदुला गर्ग,शिवानी और मालती जोशी जी आदि चाव से पढ़ते थे और मैं और मेरी बहिन तो उनकी फोटो को काटकर डायरी में चिपका कर रखते थे। इनमें मालती जी सर्वाधिक प्रिय रहीं। विवाह पश्चात कुछ लिखने में रुचि बढ़ी और साहित्यिक कार्यक्रमों में भागीदारी बढ़ती गई। मेरी प्रिय “दीदी” ने बातों बातों में बताया की मालती जी उनकी सगी चाची है, एकाएक विश्वास नहीं हुआ क्योंकि मेरे लिए इतनी बड़ी लखिका को संबंधों के दायरे में बांध पाना कुछ मुश्किल सा लगा। फिर वो दीदी के यहां पधारी और जब मैं पहली बार उनसे मिली तो विस्मित हो गई। बेहद शालीन और ऊर्जावान, चहरे पर एक आत्मविश्वास की चमक पर बातों में वो आत्मीयता कि हीरो वरशिपिंग से वो सीधे काकू बन गई। बहुत गरिमामय व्यक्तित्व था उनका। घंटो बातें हुई, वो घर पर भी पधारी और सृजन के कार्यक्रम को सुशोभित भी किया। बातों में पूछा मैंने काकू आप रचनाओं के पात्र कैसे गढ़ती हैं, की लगता हैं हम में से ही हैं। बड़ी सहजता से बोलीं गढ़ना नहीं पड़ता, सब मेरे आस पास ही हैं। हमारे लश्करे अंकल की वह इंदौर में सहपाठी भी रहीं। उन दिनों भी वे कविता – गीत लिखती गाती थीं और कॉलेज को मीरा कहलाई। मेरे कविता संग्रह “ मूक स्वरों के गुंजन “ के लोकार्पण के लिए वे विशेष रूप से बैतूल पधारी। जब मैं उन्हें आमंत्रित करने भोपाल उनके निवास पर गई तो बड़े अधिकार और ममत्व से उन्होंने उनके बनाए व्यंजन खिलाए और रेसिपी भी शेयर करी। ऐसा बहुआयामी व्यक्तित्व था उनका। मेरी पुस्तक के लिए उनके आशीर्वचन मेरी अमूल्य निधि हैं। पद्मश्री उन्हें देर से दिया गया। कभी पुरस्कारों की बात हो तो वो हंसकर कहती, मैं सरल भाषा में लिखती हूं ना, शायद इसलिए वो साहित्यिक नहीं मानते। मेरे कार्यक्रम के दौरान उनका “कथाकथन” अविस्मरणीय है। अपनी गंभीर, मंत्रमुग्ध करने वाली वाणी से अपनी कहानी को शब्दशः प्रस्तुत करने की कला संभवतः उनमें ही थी। अगर मेरे लेखन में कुछ सहज व सरल है, तो उसके लिए मैं काकू और अपने मां के प्रति कृतज्ञ हूं। उनकी पुस्तकों का संकलन मेरे लिए ही नहीं, कथा जगत की अनमोल धरोहर हैं। आपकी कथाओं को बार बार पढ़कर आपसे मिलते रहेंगे काकू…
भावभीनी श्रद्धांजलि ?
