राम, सीता, और लक्ष्मण का वनवास पतिव्रता, पितृभक्ति और भ्राता प्रेम का प्रतीक: पं.शुक्ल
राम, सीता, और लक्ष्मण का वनवास पतिव्रता, पितृभक्ति और भ्राता प्रेम का प्रतीक: पं.शुक्ल

परिधि न्यूज बैतूल
राजा ठाकुर के निवास पर किलेदार प्रागंण में पं. निर्मल कुमार शुक्ल मानस मर्मज्ञ के मुखारबिंद से भक्ति रस की गंगा बह रही है। शनिवार 5 मई को पं.निर्मल कुमार शुक्ल ने राम कथा में बताया कि प्रभु श्री राम, माता सीता और लक्ष्मणजी का वनवास पतिव्रता, पितृभक्ति और भ्राता प्रेम का प्रतीक है। पिता के वचन के पालन एवं मां की आज्ञा से समस्त राजसी सुख का परित्याग कर राम ने 14 वर्ष के वनवास पर प्रस्थान किया। पतिव्रत धर्म का पालन करते हुए मां सीता एवं भ्राता प्रेम से लक्ष्मण जी भी श्री राम के साथ वनवासी हुए। राम ने पिता की आज्ञा मानकर वनवास जाने का निर्णय लेकर राज मोह का परित्याग कर आदर्श स्थापित किया। वहीं माता सीता ने पति का अनुसरण करने एवं लक्ष्मण जी ने भाई प्रेम का उदाहरण हमारे समक्ष रखा।
अपरोक्ष रूप से माता कैकई ने श्री राम को दक्षिण दिशा में राक्षसो के आतंक को नष्ट करने स्वयं को सांसारिक दृष्टि में बुरा बनाते हुए भी जन कल्याण के लिए राजा दशरथ से राम के वनवास का वरदान मांगा था न कि अपने पुत्र भरत को राजपाठ दिलवाने। निषादराज ने भवसागर से पार लगाने वाले से गंगा पार कराने का शुल्क लिया यह स्थापित करता है कि राजा और प्रजा दोनो समान है एवं राजा को भी शुल्क देना होता है, अर्थात सामाजिक दायित्वों का समान रूप से निर्वहन करना चाहिए। जब श्री राम अयोध्या में थे तब वे राजकुमार राम थे और जब वे वन को गये तो मर्यादा पुरोषोत्तम राम बन गये। कथा में मुख्य रूप से ओम अग्रवाल, जनार्दन सिंह विदिशा, राजेन्द्र सिंह दिल्ली, शशांक सिंह पुणा, प्रेमशंकर मालवी, रमेश मिश्रा, जितेन्द्र वर्मा, राजकुमार वर्मा, मनीष सिंह, अमित सिंह, सुभाष आहूजा, दिवान सिंह, ऋषीराम सरले, बलवंत धोटे, सुनील दिवेदी पाण्डे जी एवं अन्य प्रबुद्ध श्रोतागण उपस्थित थे।