बैतूल की तासीर और स्वभाव में नहीं है पुरानी इमारतों, पुरानी बातों को सहन करना…
बैतूल की तासीर और स्वभाव में नहीं है पुरानी इमारतों, पुरानी बातों को सहन करना…
एक संवाद….प्रति सोमवार
हेमंत चंद्र दुबे “बबलु “
75 कदम 99 दिन
नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमि मिशन
इन विचारों से दीवार परदों की तरह हिलने लगी पर शर्त यह है कि बुनियाद हिलनी चाहिए सुनिए दुष्यंत कुमार लिखित और डॉक्टर कुमार विश्वास के स्वर
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आज संवाद का विषय पॉलिथिन प्लास्टिक मुक्त करने पर न होकर ऐसे विषय पर करने का हुआ जिसका धरती मां से कोई संबंध नहीं है किन्तु आजादी के 75 साल की बैतूल की खुशबू से अवश्य गहरा जुड़ाव रहा है और इसलिए इस विषय पर संवाद करने के लिए न चाहते हुए भी उस समय मजबूर हो गया जब स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सरदार विष्णु सिंग मार्ग पर स्थित पुराने ऐतिहासिक जनपद पंचायत भवन को तोड़ते हुए उसकी छाती पर चलते हथौड़ों को देखा तो मन व्यथित और दुःखी हो गया।
पुराने मज़बूत ऐतिहासिक खूबसूरत जनपद पंचायत भवन को जमींदोज कर नवीन भवन (मॉल के रूप) बना दिया जाने को कहां तक उचित कहा जा सकता हैं। हमारे शहर में 75 वर्ष पूर्व निर्मित सुन्दर और भव्य जनपद पंचायत भवन की इमारत को नेस्तनाबूद कर दिया गया। वास्तव में पुराना जनपद पंचायत भवन बैतूल का वह संसद भवन था जो गोलाकार आकृति में पीली मिट्टी से पुता हुआ बरबस ही अपनी सुन्दर मज़बूत बनावट से हर एक नागरिक का रास्ते चलते अपना ध्यान खींच लेता था। जहां एस समय वर्षों तक ग्रामीण गरीब जनता की समस्या को सुना और सुलझाया जाता रहा।आज वह ऐतिहासिक इमारत जमीन पर पड़ी अपने सीने में इस नगर की 75 वर्षो की खुशबु को दबाएं हम सब से अलविदा कह गई । यह इमारत कोई मिडिल ईस्ट के युद्ध की बमबारी में ध्वस्त नहीं हुई है बल्कि विकास के मंत्र ॐ विकास: नम: को केवल फाइल में लिख देने मात्र से मिनटों में जमींदोज हो गई है।सबसे पुरानी सरकारी प्रिंटिंग प्रेस भी उस भवन के साथ ध्वस्त हो गई जिसने न जाने कितने स्थानीय चुनावों के मतदान पत्र छापे थे।ऐसा नहीं है कि पुराने भवनों को छोड़कर नए भवन समय की आवश्यकता के साथ नहीं बनाए जा रहे है या नहीं बनाए जाना चाहिए किन्तु उनकी प्रासंगिकता और उपयोगिता को कायम रखने के लिए थोडा धैर्य से विचार किया जाना चाहिए।जैसा मध्यप्रदेश के पुराने विधानसभा भवन का ही उदाहरण ले लिया जाएं (मिंटो हाल ) के स्थान पर नया विधानसभा भवन बना दिया गया किन्तु पुराने विधानसभा भवन को तोड़ा नहीं गया बल्कि उसे और अधिक उपयोगी बना दिया गया, इसी प्रकार पुराने संसद भवन के स्थान पर नया भव्य सपनो का भवन बना दिया गया किंतु पुराने भवन को तोड़ा नहीं गया। लेकिन बैतूल में ऐसा होना संभव नहीं है पुरानी इमारतों , पुरानी बातों को सहन किया जाना अब हमारी तासीर और स्वभाव में नहीं है। क्या बैतूल में हमारे पास सरकारी जमीनों का अभाव था जो इस खूबसूरत ऐतिहासिक जनपद पंचायत भवन को तोड़ा जाना आवश्यक हो गया था । आज यदि सर्वे किया जाता तो न जाने कितनी सरकारी अनुपयोगी भूमि पड़ी हुई खोजी जा सकती थी । क्या इस पुराने पंचायत भवन में बैतूल के स्वतंत्रता के इतिहास को सुंदर ढंग से नहीं संजोया जा सकता था? क्या बैतूल की समृद्धशाली सांस्कृतिक विरासत को लेकर इस भवन का उपयोग नहीं किया जा सकता था? आजीविका मिशन के नाम क्या दूसरे निर्माण स्थल का चयन नहीं किया जा सकता था ? जो अधिकारी आते है वे हमारे नगर के लिए अप्रवासी होते है उन्हें इन सब बातों से बहुत ज्यादा लेना देना नहीं होता है , वे सिर्फ लेने देने में रुचि रखते है जिसके चलते वे हमारे जन प्रतिनिधियों के मन मस्तिष्क में एक से एक ख्वाबों से भरी योजनाओं के खूबसूरत रंगीन सपनो के मानचित्र खींच देते हैं ।ऐतिहासिक सुन्दर बैतूल का पुराना पंचायत भवन इतिहास के पन्नों में अब दफन कर दिया गया।हम अब नवीन तकनीक से भरपूर आजीविका मिशन के नाम पर बने मॉल का आनंद उठाएंगे जहां हम तेज रोशनी में मोटे अनाज और स्वदेशी वस्तुओं को खरीदेंगे। हमारी सोच विरासत को लेकर हो सकती है तो दूसरों की सोच रोजगार देकर परिवारों की भलाई के लिए हो सकती है उससे इनकार नहीं किया जा सकता है। प्रश्न केवल इतना है कि क्या वैकल्पिक स्थानों का चयन करते हुए विरासत को नहीं बचाया जा सकता था ।क्या यह नवीन भवन दूसरे स्थान पर पुराना भवन बिना क्षतिग्रस्त किए नहीं बनाया जा सकता था ? मैं हर विषय का ज्ञाता नहीं हूं कि मुझे लिखना या बोलना ही चाहिए किन्तु जब हमारी आंखों के सामने हमारी विरासत को शासन के हाथों से नेस्तनाबूद किया जाता है तो जिम्मेदार नागरिक की हैसियत से दुःख के साथ आवाज उठाने के लिए मजबूर होना पड़ता है । जब पुरानी सराय तोड़ी गई थी तब वह कार्य भी किसी भी दृष्टी से प्रशंसनीय नहीं कहा जा सकता था उस सराय का भी जीर्णोद्धार किया जाना चाहिए था न कि तोड़ा जाना चाहिए था और उस समय भी प्रबुद्ध नागरिकों और पत्रकारों ने यह मुद्दा उठाया था । अब देखिए जीर्ण शीर्ण हो चुकी नेहरू युवा केंद्र की बिल्डिंग किसी को नहीं दिख रही है जो कभी भी जानलेवा बन सकती हैं। लेकिन उससे अद्भुत प्रेम दिखलाई पड़ रहा है।खैर अब तो पुराना जनपद पंचायत भवन स्वर्ग सिधार गया है उस पुराने भवन की असमय मृत्यु हो जाने पर उसके कदमों में मैं अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करता है।विचार किसी की भी व्यक्तिगत आलोचना या बुराई नहीं है न ही किसी की भावना या रोजी रोटी को वंचित करने के उद्वेश्य से लिखे गए हैं। केवल और केवल अपनी विरासत को उजड़ते देख भविष्य में फिर किसी पुराने ऐतिहासिक भवन के साथ ऐसा न हो इस बात का ध्यान रखा जाय क्योंकि अभी बचे कुछ पुराने भवन नगर में है जिन्हें बचाए रखना होगा।किसी की भावना, सम्मान को यदि प्रकट किए विचारों से ठेस पहुंचती हैं तो करबद्ध हाथ जोड़कर मैं माफी चाहता हूं।

