“एक थी चिड़िया” बाल कविता संग्रह में सब प्राणियों को सकारात्मक और बराबरी की दृष्टि से देखने का एहसास
बीज में मनुष्यता का सच्चा स्वरूप तो, एक थी चिड़िया कविता में जीवन दृष्टि
✓”एक थी चिड़िया” बाल कविता संग्रह में सब प्राणियों को सकारात्मक और बराबरी की दृष्टि से देखने का एहसास
✓बीज में मनुष्यता का सच्चा स्वरूप तो, एक थी चिड़िया कविता में जीवन दृष्टि
शब्द परिधि बैतूल
साहित्यकार का स्वचिंतन

आज अपना एक बहुत ही विशिष्ट अनुभव साझा कर रहा हूँ। यह अनुभव हुआ 19 अक्टूबर,2024 को साहित्य अकादेमी के सभागार में। अवसर था स्व. फूलचंद यादव की पहली पुस्तक (बाल कविता-संग्रह) का लोकार्पण।वस्तुत: मेरी निगाह में, यह अवसर इस पुस्तक के साथ एक आदर्श और प्रेरणादायी पुत्र कमांडेंट सुभाष यादव के लोकार्पण का भी रहा।सुभाष यादव फूलचंद यादव जी के तीन पुत्रों में सबसे बड़े पुत्र हैं। कार्यक्रम को भावांजलि नाम दिया गया।एक बहुत ही गम्भीर, समृद्ध और ऐतिहासिक चर्चा गोष्ठी का आनंद अब तक मेरे साथ है। लोकार्पण के अवसर पर बालसाहित्य पर इतनी गम्भीर चर्चा-गोष्ठी हो सकती है, ऐसा अपवाद स्वरूप लगा।आयोजन ‘ कस्तूरी’ ने किया।
समीक्षा: “एक थी चिड़िया”(बाल कविता संग्रह)
दिविक रमेश”साहित्यकार”

संदर्भ -“एक थी चिड़िया” फूलचंद यादव, सर्वभाषा ट्रस्ट , 2024, सुभाष चंद्र यादव , 19 अक्टूबर, 2024 , साहित्य अकादेमी सभागार
फूलचंद यादव ( 3 अगस्त, 1949 – 27 अगस्त 2022) जी की पहली पुस्तक के रूप में यह पुस्तक ‘एक थी चिड़िया’ है जो बाल कविताओं को संजोए हुए है और अंकुर अटवाल के सुंदर चित्रों से सुसज्जित है।पुस्तक बहुत ही सुंद्र और रुचिकर रूप में प्रकाशित हुई है। इस पुस्तक को पाठकों के सामने लाने का पूरा श्रेय, प्रकाशक सर्वभाषा ट्रस्ट के माध्यम से, स्व. फूलचंद यादव के सुपुत्र सुभाष चंद्र यादव को जाता है। पुस्तक में छपे उनके ‘दो शब्द’ अवश्य पढ़े जाने चाहिए। उन्होंने लिखा है- “ पिताजी का विचार, शिक्षा और धर्म का फल हम सभी भाइयों को मिला है। आज वे भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, किंतु हमारा प्रयास है कि उनके विचार लोगों तक पहुँचा सकें।“ उन्होंने अपने पिता के संबंध में यह महत्त्वपूर्ण जानकारी भी दी है, ‘ उन्होंने अपने जीवन के संघर्ष में कभी भी धैर्य और हिम्मत नहीं खोया। उनका मानना था कि जितना घिसे जाओगे उतना ही चमकोगे, सोचने-समझने की क्षमता बड़ेगी।यह जानना भी महत्त्वपूर्ण है कि उनके व्यक्तित्व का महत्त्वपूर्ण पक्ष: सतत अध्ययन-अध्यापन और समाज सेवा रहा । सेवानिवृत होने के बाद तो पूरा समय लिखने-पढ़ने को समर्पित किया।वे मूलत: कवि हृदय थे।उनका रचना क्षेत्र, गीत, गजल, मुक्त और छंदोबद्ध कविताएँ रहा।वे यश कामी नहीं रहे। स्वांत: सुखाय ही रचनारत रहे। अत: रचनाओं के प्रकाशन की ओर उनका ध्यान नहीं गया।विशेष रूप से कहना चाहूँगा कि एक बाल कविता-संग्रह के रूप में तो इस पुस्तक का अपना महत्व है ही लेकिन इस पुस्तक का अपने पाठकों, विशेष रूप से नन्हे और युवा पाठकों के लिए एक और अधिक महत्त्वपूर्ण तथा प्रेरणादायी पक्ष यह है कि सुभाष चंद्र यादव ने एक पुत्र के रूप में अपने स्वर्गीत पिता की रचनात्मकता के खजाने को सबसे साझा करने का जरूरी काम किया है जो इस जमाने में अपवाद स्वरूप ही कहा जाएगा।

मुझे याद आ रहा है कि जब मैं साहित्य अकादेमी के लिए अपने संपादन में बाल साहित्य की एक पुस्तक तैयार कर रहा था तब मुझे ऐसी संतान भी देखने को मिली जिसने अपने स्वर्गीय लेखक पिता की रचना देने से साफ मना कर दिया। उसमें रुचि न होने के कारण। अत: एक आदर्श पुत्र के रूप में मैं सुभाष चंद्र यादव जी को प्रणाम करता हूँ।वस्तु और शिल्प आदि की दृष्टि से यह पुस्तक अपनी विविधधर्मी रचनाओं के कारण विशिष्ट कही जा सकती है। यहाँ भाषा-शैली के स्तर पर लोक और बोली भी है तो रूप के स्तर पर प्रयोगधर्मी संवादयुक्त कविता भी है तो प्रभाती (जागो राज दुलारे) आदि भी और साथ ही काव्य-कथा रूप में बीज जैसी कविता भी। वस्तुगत विविधता के रूप में प्रकृति, पर्यावरण, पशु-पक्षी जगत, महापुरुष आदि हैं। सबसे बड़ी बात है इन रचनाओं में समायी वह जरूरी दृष्टि जो सब प्राणियों को सकारात्मक और बराबरी की दृष्टि से देखती है। इस दृष्टि को खासकर ‘काग’ कविता और तुलसी के काग कविताओं में देखा जा सकता है। यहाँ उनके प्रति रुढ़िगत सोच पर सकारात्मक प्रहार किया गया है। मनुष्यता का सच्चा रूप क्या होना चाहिए इसकी समझ ‘बीज’ कविता में बखूबी समायी हुई है जिसे बीज के रूपक से चित्रित किया गया है। ये कविताएँ अनेक अर्थ छवियों से सम्पन्न हैं।एक थी चिड़िया कविता में जीवन दृष्टि के रूप में अपनी निजी मौज मस्ती और दूसरों के हित का ध्यान रखना मजे-मजे में रेखांकित हुआ है। ‘चकर-बकर’ जैसे शब्द आकर्षित हैं।हे विहंग में फिर पक्षी के माध्यम से अपने जीने को अपने ढंग से जीने की स्वतंत्रता का भाव महत्त्वपूर्ण ढंग से उभरा है।
हे विहंग!
तू कहाँ से आई, कहाँ है तेरा डेरा?
आओ मेरे घर आँगन में, करो मुंडेर बसेरा।
आई हूँ मैं बड़ी दूर से, पर्वत पेड़ है डेरा
मैं विहंग अम्बर में बिहरूँ, क्यूँ किसी के घर हो डेरा..।
ये कविताएँ ( एक अपवाद को छोड़ दिया जाए तो), आज की उन उत्कृष्ट कविताओं के समकक्ष हैं जो उपदेश देने की बजाए अपने पाठक को मित्रवत मानकर उसके साथ समझ साझा करने की पद्धति अपनाती हैं। अत: ये महत्त्वपूर्ण और जरूरी कविताएँ हैं।
मैं इनका स्वागत करता हूँ।
दिविक रमेश”साहित्यकार”