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श्रद्धेय फूलचंद यादव जी की पुस्तक ‘एक थी चिड़िया’ के माध्यम से भावांजलि 19 को

✓श्रद्धेय फूलचंद यादव जी की पुस्तक ‘एक थी चिड़िया’ के माध्यम से भावांजलि 19 को
परिधि न्यूज बैतूल

” एक थी चिड़िया ” पुस्तक वास्तव में प्रकृति और इसके उपादानों का प्रतिबिंब है। इस पुस्तक में संयोजित कविताओं के रचयिता स्व.श्री फूलचंद यादव जी को ”एक थी चिड़िया” के माध्यम से भावांजलि अर्पित करने का भावनात्मक प्रयास कस्तूरी द्वारा किया जा रहा है।

19 अक्टूबर को साहित्य अकादमी, रवींद्र भवन नई दिल्ली में अपरान्ह तीन बजे से आयोजित कार्यक्रम भावांजलि की अध्यक्षता साहित्यकार दिविक रमेश करेंगे।वही मुख्य वक्ता शिक्षाविद  प्रो. संध्या वात्‍स्‍यायन, वक्ता कथाकार वंदना यादव, कवि एवं कथाकार कल्पना मनोरमा द्वारा पुस्तक के संदर्भ में विचार व्यक्त किए जाएंगे। कार्यक्रम की भूमिका सुभाष यादव ( कमांडेंट, आई. टी. बी. पी.) द्वारा तथा स्वागत वक्तव्य दिव्या जोशी (भक्ति साहित्य अध्येता)द्वारा प्रस्तुत किया जाएगा।धन्यवाद ज्ञापन साहित्य अध्येता आदित्य नाथ तिवारी तथा सूत्रधार की भूमिका में  साहित्य एवं कला अध्येता विशाल पाण्डेय होंगे।

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यहां होगा कार्यक्रम

भावांजलि कार्यक्रम 19 अक्टूबर को अपरान्ह 3 बजे से तृतीय तल, साहित्य अकादमी, रवींद्र भवन, 35 फिरोजशाह रोड, नई दिल्ली- 110001 नजदीकी मेट्रो स्टेशन मंडी हाउस में आयोजित होगा।इस कार्यक्रम से साहित्यप्रेमी कस्तूरी के फेसबुक पेज से जुड़कर लाइव देख सकेंगे।

”एक थी चिड़िया” साहित्यकार को जानिए

श्री फूलचंद यादव का जन्म बस्ती जिले के अहरा नामक गाँव के एक धार्मिक परिवार में हुआ था। इनकी प्राथमिक शिक्षा घर पर ही रामायण से हुई तथा सीधे चौथी कक्षा में एडमिशन हुआ। गोरखपुर विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् मगहर, संत कबीर नगर तथा जनता इंटर कॉलेज, लालगंज, बस्ती में अध्यापन कार्य करने लगें। अध्यापन के साथ-साथ टीचर वेलफेयर यूनियन, धर्म एवं समाज सेवा जैसे कई सामाजिक कार्यों से जुड़े रहें । 27 अगस्त, 2022 में इनका देहावसान हो गया। फूलचंद जी हृदय से कवि थे और गद्य मात्र वैचारिक साधन था। अध्ययन-अध्यापन के साथ साथ स्वान्तः सुखाय के लिए निरंतर लेखन-कार्य करते रहें, किंतु रुचि को कभी प्रसिद्धी प्राप्ति का ज़रिया नहीं बनाया। इनकी कविताओं में परिवार-प्रेम, देश-प्रेम, प्रकृति-प्रेम, ईश्वरीय-चेतना तथा मानवीयता सहज ही चित्रित है। बिना लाग-लपेट के सहज एवं प्रवाहात्मक शैली में गीत, गज़ल, मुक्त एवं छंदबद्ध कविताओं में जीवन-मूल्यों की स्थापना के प्रति अत्यंत सजग दिखाई देते हैं।

कविताओं में झलकता प्रकृति प्रेम

धरोहर
हे मानव! कमर कसो अब,
तुम कुछ ऐसा काम करो।
पर्यावरण प्रदूषित हो रहा,
इसका त्वरित निदान करो॥
बन चुकी है विश्व समस्या,
सब मिल इस पर काम करो।
प्रदूषण कम फैलाओ,
इस पर सतत् लगाम कसो॥
गाँव नगर व पार्क सड़क पर,
वृक्षारोपण का कार्य करो।
इनकी सुरक्षा रख-रखाव पर,
नियमित सतत् प्रयास करो॥
आज विश्व पर्यावरण दिवस पर
सब मिलकर संकल्प करो।
नित्य-प्रति क्षमता बढ़े धरा की
जग में व्याप्त विकार हरो॥
वृक्ष वनस्पतियाँ लगा लगा कर,
हरा भरा धरती को बनाएँ।
पुष्प-लता संरोपण कर,
चहुँ दिशि धरा को महकाएँ॥
इस संकल्प को धारण कर हम,
मिलजुल विश्व पर्यावरण दिवस मनाएँ।
सुख-शांति-सम्पन्न हो मानव,
धरती को इस योग्य बनाएँ॥
***
वृक्ष धरा के आभूषण
वृक्ष धरा के आभूषण हैं,
वसुधा का श्रृंगार करें।
पुष्प, लता व अन्न उगाकर,
धन-धान्य से परिपूर्ण करें॥
लकड़ी बहुत काम आती है,
अन्न वायु जल जीवन देते।
औषधि विविध भाँति धरती पर,
दुःख कष्ट हर, सुख हैं देतें॥
वृक्ष की तुलना नहीं किसी से
वसुन्धरा के हैं वरदान।
यत्र-तत्र जनश्रुति है प्रसरित,
एक वृक्ष दस पुत्र समान॥
ऋषि मुनि ज्ञानी ध्यानी सबकी,
वृक्ष की छाया में मिटी प्यास।
जन्म से लेकर मृत्यु तक
निहित पंचतत्त्व का ही आस॥
साभार

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