आदिवासी प्रसूता को सात किमी तक खटिया पर लेकर मुख्य मार्ग तक पहुंचे ग्रामीण, तब मिली एम्बुलेंस की मदद
गांव की महिलाओं ने कराया प्रसव, ये है स्वास्थ्य सुविधाओं के साथ विकास की मुंह चिढ़ाती तस्वीरें

✓आदिवासी प्रसूता को सात किमी तक खटिया पर लेकर मुख्य मार्ग तक पहुंचे ग्रामीण, तब मिली एम्बुलेंस की मदद
✓गांव की महिलाओं ने कराया प्रसव, स्वास्थ्य सुविधाओं के साथ विकास की मुंह चिढ़ाती तस्वीरें
✓राज्यमंत्री से लेकर पांच विधायकों के जिले में कई जगह है ऐसे हालात
✓76 वर्षों से एक अदद सडक़ को तरसे भवईपुर के आदिवासी
परिधि न्यूज बैतूल/भीमपुर

चमचमाती सडक़े, दनदनाती ट्रेने और मंजिलों ईमारतों का विकास उस वक्त बौना लगता है जब देश के ग्रामीण अंचलों में आज भी महिलाओं को प्रसव के लिए चार कंधों पर खटिया के सहारे सफर करना पड़ता है। वैसे तो यह तस्वीरें बैतूल जिले में आम है। हर वर्ष बारिश के दिनों में आदिवासी एवं दूरस्थ ग्रामों की एक न एक तस्वीर विकास के तमाम दावों को खोखला साबित कर देती है। ताजा मामला भीमपुर विकासखंड का है जहां एक आदिवासी गर्भवती का मजबूरी में गांव में ही प्रसव कराना पड़ता है, क्योंकि मुख्य मार्ग से 7 किमी दूर बसे इस ग्राम में आज भी एम्बुलेंस नहीं पहुंच पाती। आदिवासी महिला ने 4 जुलाई गुरुवार को गांव में ही जुड़वा बच्चों को जन्म दिया। सुरक्षित प्रसव के बाद महिला एवं नवजात बच्चों को खटिया से मुख्य मार्ग तक लाया गया और यहां से भीमपुर स्वास्थ्य केन्द्र एम्बुलेंस से ले जाया गया।

प्राप्त जानकारी के अनुसार भीमपुर विकासखंड मुख्यालय से 42 किमी दूर ग्राम पंचायत चिल्लौर के अंतर्गत आने वाले ग्राम भवईपुर में गुरुवार को गर्भवती महिला सोनाय बाई को एम्बुलेंस की सुविधा नहीं मिल पाई। प्रसव पीड़ा होने पर गांव की महिलाओं ने घर पर ही महिला का प्रसव कराया। महिला ने दो स्वस्थ शिशुओं को जन्म दिया। सुबह करीब 8 बजे प्रसव के बाद करीब डेढ़ घंटे खाट पर महिला एवं उसके नवजात बच्चों को डालकर ग्रामीणों ने आशापुर मार्ग तक लाया। यहां एम्बुलेंस से जच्चा बच्चा को भीमपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र लाया गया। करीब 10.30 बजे प्रसूता सोनाय और दोनों बच्चों को भीमपुर हास्पीटल में परीक्षण करने के बाद एनीमिक होने के कारण महिला को जिला अस्पताल रिफर कर दिया गया। महिला एवं दोनों बच्चे फिलहाल जिला अस्पताल में सुरक्षित है।
एक वर्ष पहले भी बनी थी यह स्थिति

बारिश के दिनों में भवईपुर के रास्ते बंद हो जाने से ग्रामीणों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है। गांव तक पहुंचने के लिए मुख्य मार्ग से बैलगाड़ी रास्ता है, बारिश के दिनों में इस रास्ते पर चलना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे में गर्भवती महिला, बीमार, बुजर्ग एवं स्कूली बच्चों को भी तमाम कठिनाईयां होती है। एक वर्ष पहले भी एक गर्भवती महिला को भवईपुर में इन्हीं दिक्कतों से गुजरना पड़ा था।
काश जनआरोग्ग केन्द्र शो पीस न बना होता
भीमपुर विकासखंड वैसे भी कुछ वर्ष पहले तक बैतूल जिले का कालापानी कहा जाता रहा है। बीमारु विकासखंड के रुप में इसकी पहचान है। भीमपुर को बीमारु या पिछड़ा यदि कहा जाता है तो इसके पीछे कहीं न कहीं प्रशासन और जनप्रतिनिधि दोनों ही जिम्मेदार है। अन्य विकासखंडों की तरह यहां भी प्रशासनिक अमला है, सुविधाएं भी है पर कमी सिर्फ प्रशासनिक अमले से काम लेने वाले जिम्मेदार और गंभीर अधिकारियों की है। यहां तो अधिकारी ही लापरवाह बने हुए है तो मैदानी अमले से कैसे उम्मीद की जा सकती है। इसकी बानगी चिल्लौर के जन आरोग्य केन्द्र पर देखी जा सकती है। यहां पदस्थ सीएचओ मीना टेकाम के संबंध में ग्रामीणों का कहना है कि केन्द्र अक्सर बंद रहता है। मेडम आती भी है तो बस वैक्सीनेशन वाले दिन या फिर 15-20 दिनों में एक बार हाजरी रजिस्टर पर साईन करने। यदि जनआरोग्य केन्द्र से सीएचओ भी चाहती तो भवईपुर में महिला का सुरक्षित प्रसव करा सकती थी गौरतलब है कि यहां एएनएम का पद रिक्त है। वहीं बीएमओ डॉ संदीप धुर्वे के संरक्षण में सीएचओ भी बस ड्यूटी के नाम पर खानापूर्ति कर रही है। ग्रामीणों की सुविधा के लिए बनाया गया जन आरोग्य केन्द्र शोपीस मात्र बनकर रह गया है।
गौरतलब है कि बी एम ओ डॉ धुर्वे को मीडियाकर्मियों के मोबाइल नबर ब्लैक लिस्ट में रखने और उनका कॉल न उठाने की भी गैर जिम्मेदाराना आदत है। एक जिम्मेदार अधिकारी यदि मीडिया के सवाल से बचने के लिए इस तरह गैर जिम्मेदार रवैया अपनाए तो भीमपुर के हालत पर सुधार को लेकर वह कितने गंभीर हो सकते है इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।