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मुलताई दंगों के उन ‘चेहरों’ के नाम… जिन्होंने सिर्फ एक ठेला नहीं, एक स्वाभिमानी नस्ल उजाड़ दी!

मुलताई दंगों के उन ‘चेहरों’ के नाम… जिन्होंने सिर्फ एक ठेला नहीं, एक स्वाभिमानी नस्ल उजाड़ दी!

✍️पाशा खान, मुलताई 

​सुनो ओ ‘दंगाइयों’! नफरत की जिस आग को तुमने हवा दी थी, आज उसकी राख में एक स्वाभिमानी परिवार पूरी तरह दफन हो गया है। जब तुम नामदेव बचले का ठेला जला रहे थे, उसके फल लूट रहे थे, तब शायद तुम्हें लग रहा होगा कि तुमने किसी को नीचा दिखा दिया या अपनी “ताकत” साबित कर दी। पर आज अपनी इस कथित “उपलब्धि” का वो खौफनाक अंजाम देख लो, जिसे तुमने अपनी नफरत से लिखा है:
​तबाही का वो सिलसिला, जो तुमने शुरू किया:
​पहली मार (लूट और आग): सबसे पहले तुमने उस गरीब की मेहनत से सजी दुकान लूटी और फिर ठेले को आग के हवाले कर दिया। वो सिर्फ लकड़ी और लोहे का ढांचा नहीं था, उस परिवार की रोजी-रोटी की एकमात्र उम्मीद थी।
​बीमारी का हमला: रोजी-रोटी छिन जाने के सदमे और आर्थिक तंगी के बीच नामदेव की बीवी गंभीर रूप से बीमार पड़ गईं। घर में दाने-दाने की किल्लत हो गई।
​तंगी और मौत: ठेला जलने के बाद आई भयानक पैसे की तंगी के कारण सही इलाज नहीं मिल पाया। बीमारी और मुफलिसी से जूझते हुए बीवी अंततः दम तोड़ गई।
​पिता की आत्महत्या: उजड़ा हुआ संसार, अपनी बेबसी और अब बालीग हो चुके दिव्यांग बेटों के भविष्य की चिंता ने स्वाभिमानी पिता नामदेव को पूरी तरह तोड़ दिया। कल, उसी बेबसी और शराब के नशे में जहर पीकर उसने भी जान दे दी।
​पीछे क्या बचा?
​तुम्हारी नफरत की फसल का फल काटने के लिए पीछे रह गए हैं- कुदरत के मारे दो युवा, बालीग भाई। दोनों अब बच्चे नहीं हैं, लेकिन दुनिया की ठोकरें खाने के लिए बिल्कुल अकेले हैं। एक भाई जिसकी आँखों में रोशनी नहीं है, और दूसरा जिसके कानों में दुनिया की कोई आवाज़ नहीं पहुँचती।
​तुमने जो फल लूटे थे, उनका स्वाद तो तुम शायद भूल चुके होगे, लेकिन उन फलों की कीमत आज नामदेव के बेटों की अनाथ आँखों और खामोश चेहरों पर साफ नजर आ रही है। क्या उन लाचार युवाओं की खामोश सिसकियां तुम्हें चैन से सोने देंगी?
​याद रखना, भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता, लेकिन पाप का अपना एक हिसाब होता है। तुमने एक गरीब की रोजी-रोटी नहीं छीनी, तुमने दो दिव्यांग युवाओं के जीने का आखिरी सहारा और आत्मनिर्भरता की उम्मीद भी छीन ली। आज नामदेव की मौत, उसकी पत्नी की बीमारी और इन दो युवाओं की लाचारी के असली जिम्मेदार तुम और तुम्हारी नफरत है।
​शर्म करो मुलताई के उन चेहरों, जो इंसानियत जलाकर आज भी आज़ाद घूम रहे हैं!

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