भाडरीढाना कन्या आश्रम रसोइए के भरोसे, 70 सीटर आश्रम में 2 साल में नहीं नजर आए 30 से ज्यादा बच्चे
बच्चों की सेहत से खिलवाड़..नाश्ते और भोजन के नहीं निकाले जाते सैंपल, अधीक्षिका को नहीं मालूम कितनी बालिकाएं है आश्रम में मौजूद!

✓ कन्या आश्रम के कर्मचारियों पर नहीं अधीक्षिका का नियंत्रण आश्रम के गेट से लेकर भंडार तक की चाबी रसोइए के पास
✓कक्षा 1 से 5 तक बालिकाएं करती है आश्रम में निवास
परिधि ग्राउंड रिपोर्ट- 1

किसी आश्रम शाला का संचालन यदि रसोइया संभालें तो यहां की व्यवस्थाओं का अंदाजा लगाया जा सकता है।जिले के भीमपुर विकासखंड के भाडरीढाना में यही आलम है। यहां अधीक्षिका बैतूल से अप डाउन करती है और आश्रम शाला की पूरी बागडोर रसोइए के हाथ में है। अधीक्षिका और रसोइया रिश्तेदार है और दोनों आश्रम शाला का बंटाधार कर रहे है।यहां तक कि आश्रम की सभी चाबियां भी इसी रसोइए के पास है। यदि किसी काम से रसोइए को बाहर जाना हो तो बच्चे पानी पीने के लिए भी मोहताज हो जाते है।
जिले में शिक्षा व्यवस्था बेपटरी है, दूरस्थ अंचलों की आश्रम शालाओं में तो हालात और भी बदतर है। यहां न तो कोई निगरानी करने वाला है और न ही किसी की मॉनीटरिंग, जिसकी वजह से बेखौफ होकर अधीक्षकों की मनमर्जी चल रही है। शासकीय कन्या आश्रम भाडरीढाना में लम्बे समय से छात्रावास में अनियमिताओं की शिकायत मिल रही है। आज जब परिधि न्यूज की टीम मौके पर पहुंची तो अधिकांश शिकायतें सही पाई गई। आश्रम में दर्ज संख्या 70 बताई जा रही है, लेकिन मौके पर मात्र 26 छात्राएं ही थी। इस पूरे आश्रम का नियंत्रण अधीक्षिका के हाथ में न होकर यहां के रसोईये के नियंत्रण में है। आलम यह है कि यदि बच्चों को पानी भी यदि पीना हो और रसोईयां आश्रम में न हो तो बच्चे एक गिलास पानी को भी मोहताज हो जाते है।
इतना साफ रसोई घर, जैसे महीनों बना ही नहीं हो भोजन
आमतोर पर किसी शासकीय संस्थान में निरीक्षण के दौरान साफ सफाई के लिए हिदायतें दी जाती है, लेकिन इन सबसे अलग भाडरीढाना के आश्रम में रसोई इतनी साफ थी जैसे यहां भोजन बनाया ही नहीं जाता। सबसे अचरज की बात जिस गैस चूल्हे पर भोजन बनाने का दावा किया जा रहा है, उस चूल्हे से गैस सिलेण्डर भी अटैच नहीं था। पीने का पानी भरने के पात्र भी उल्टे रखे थे। रसोई को देखकर कोई भी कह सकता है कि यहां भोजन बनता ही नहीं है। यहां पीने के पानी की सभी केन भी खाली थी।
अधीक्षिका का रिश्तेदार है रसोईयां मिलीभगत से चल रहा काम

प्राप्त जानकारी के अनुसार अधीक्षिका ढिल्लो पान्से बैतूल से अप डाउन करती है, भाडरीढाना गांव इस अधीक्षिका का मायका है और यहां पदस्थ रसोईया रिश्तेदार है, इसी रिश्तेदार को आश्रम का संचालन करने का दारोमदार दे रखा है। आश्रम की चाबियों का गुच्छा अधीक्षिका के पास न होकर रसोईयों की जेब में रहता है। जब आश्रम अधीक्षिका से भंडार एवं रसोई के अलावा बच्चों को दिए जाने वाले नाश्ते, भोजन एवं अन्य सामग्रियों के संबंध में जानकारी चाही तो वे बगले झांकने लगी। इसी के साथ चाबी रसोईये के पास होने का बहाना बना दिया। अधीक्षिका कभी रसोइए का गांव में जाना, कभी गेहूं पिसवाने, कभी बीमार सास को देखने जाने तो कभी बाजार से सब्जी लेने जाने के अलग अलग बहाने बनाती रही।सूत्र बताते है कि आश्रम के भंडार एवं क्रय विक्रय में दोनों रिश्तेदार मिलकर जमकर धांधली कर रहे है। बच्चों की दर्ज संख्या और प्रतिदिन बनने वाले भोजन की मात्रा में भी बड़ा अंतर है। दो वर्षों से आश्रम में पदस्थ अधीक्षिका के यहां ठाठ है, इसकी वजह भी यही है कि दूर जंगल क्षेत्र में स्थित आश्रम का निरीक्षण करने में न तो अधिकारी ध्यान देते है और न ही अन्य जिम्मेदार।
अधीक्षिका को मालूम ही नहीं कितने बच्चे है मौजूद
कन्या आश्रम की अधीक्षिका के गैर जिम्मेदार होने का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें आश्रम में कितनी छात्राएं मौजूद है इसकी भी जानकारी नहीं है। कभी 26 तो कभी 30-35 बालिकाओं के मौजूद होने की उनके द्वारा जानकारी दी गई तो कभी कहा कि यहां 60 बच्चे है। यहां बच्चों को दिए जाने वाले भोज्य पदार्थ का मेन्यू तक नहीं है। उनके मुताबिक सुबह 10 बजे बालिकाओं को नाश्ते में पोहा दिया गया था और दोपहर 12 बजे उन्हें दाल, चावल, सब्जी और रोटी दी गई लेकिन दाल और सब्जी क्या बनी थी यह जानकारी ही बच्चों को नहीं थी।
बच्चों के सेहत से खिलवाड़ का कौन होगा जिम्मेदार ? सैम्पल निकालने से भी परहेज
प्रत्येक छात्रावास एवं समूह को स्कूली बच्चों को वितरित किए जाने वाले भोजन का सैम्पल 12 घंटे तक रखना होता है। लेकिन भाडरीढाना की आश्रमशाला संभवत: पहला ऐसा आश्रम है जहां नियमों को ताक पर रखा जाता है। कई बार जब बच्चे फुड पॉयजनिंग का शिकार हो जाते है ऐसे में भोजन के सैम्पल की जांच कराई जाती है। इसके अलावा बनाए गए भोजन को किसी जिम्मेदार व्यक्ति को पहले चखना होता है, लेकिन इस आश्रम में सारे नियम ताक पर है। इस आश्रम में सुबह बने पोहे एवं दोपहर में बने दाल, चावल, सब्जी-रोटी के सैम्पल तक नहीं निकाले गए थे। जिस स्थान पर बर्तन साफ किए जाते है वहां पोहे, दाल, चावल का एक दाना तक नहीं था, जो छात्राओं को मेन्यू के हिसाब से दिए जाने वाले भोजन को लेकर संदेहजनक है। इसके अलावा कन्या आश्रम की रसोई में सामग्री के नाम पर हल्दी, नमक और मिर्च का डिब्बा मात्र था, जो गुणवत्ता पर सवाल उठाने के लिए भी काफी है।
इनका कहना…
कितने बच्चों का भोजन आज बनाया गया यह ऑनलाईन दर्ज करना होता है, मैं अभी मीटिंग में हूं मैं एमपी टास्क पर चेक करने के बाद आपको कॉल करके जानकारी देती हूं।
शिल्पा जैन, सहायक आयुक्त बैतूल