PARIDHI GOSSIP:सोने के अंडे देने वाले मुर्गे..!

सोने के अंडे देने वाले मुर्गे..!
बचपन में सोने के अण्डे देने वाली मुर्गी की कविता तो हमने सभी ने पढ़ी-सुनी है, लेकिन ये कलयुग है यहां मुर्गें भी सोने के अण्डे दे सकते है। ऐसा आश्चर्यजनक सत्य बैतूल में भी यदा-कदा देखने मिल जाता है। जिले मेंं एक विभाग में दो वर्तमान और एक सेवानिवृत्त खिलाड़ी, साहब के लिए सोने के अण्डे जुटाते है साथ-साथ अपने लिए भी खुरचन का इंतजाम कर ही लेते है। दोनों हाथों में लड्डू और सर कढ़ाई में वाली कहावत को चरितार्थ करने के लिए हर शाम को तिकड़ी की अधिकारी के साथ चौपाल बैठती है और फिर बिसात बिछाई जाती है। यहां सबसे अधिक उम्रदराज सेवानिवृत्त माहिर खिलाड़ी अपने अनुभवों के आधार पर गुणा-भाग करते है। इस खिलाड़ी को सहकर्मियों ने तो बाकायदा विदाई समारोह का आयोजन कर विदा कर दिया है, लेकिन कुर्सी का मोह है कि छूट ही नहीं रहा। अपनी कमांड बचाए रखने के लिए अपने ही एक शागिर्द को अपने हुनर का ककहरा सेवानिवृत्त खिलाड़ी ने सिखा दिया है। इधर शागिर्द खिलाड़ी आफिस में तो तीसरा खिलाड़ी फिल्ड में अपनी पैठ जमाएं है। साहब ने गुरु से लेकर चेले तक को इस शर्त पर फ्री हैण्ड देकर रखा है कि हर दिन सोने के अण्डे किसी भी सूरत में मिलने चाहिए बस। सुना है पिछले कुछ दिनों से साहब की गृहदशा भी ठीक नहीं चल रही है और बेकार की उलझनों में पूरी चौपाल ध्वस्त होने से सोने के अण्डों की आवक भी कम हो गई। जिससे हैरान-परेशान सेवानिवृत्त खिलाड़ी ने साहब को आखिरकार सलाह दे डाली कि साहब वास्तुदोष की वजह से गृह-दशा विपरीत है और गृहदशा का असर मनोदशा पर भी विपरीत पड़ रहा है। अब तो आपको पूरब से उत्तरमुखी होने की जरुरत है। फिर क्या अगले ही दिन साहब उत्तर मुखी हो गए। भले ही साहब ने सेवानिवृत्त खिलाड़ी की बात मानकर अपने वास्तुदोष और गृहदशा निवारण के लिए कारगर उपाय कर लिया है, लेकिन पता नहीं क्यों बचे हुए दोनों खिलाड़ी हर जगह यह ढिंढोरा पीट रहे है, कि साहब के उत्तरमुखी होने के पीछे किसी भी चटकारे का कोई लेना-देना नहीं है..!