मेरे बाबूजी लोगों की पीड़ा हरने नंगे पैर नाप लेते थे मीलों लंबी दूरी: डॉ राजा धुर्वे
➡️खुद अभावों में रहकर बेटों को दिया शिक्षा और परोपकार का संस्कार
➡️आदिवासी किसान पिता के समर्पण-सेवा और त्याग की कहानी
परिधि फादर्स डे विशेष

धूप, बारिश, ठंड मौसम चाहे कोई भी हो उन्होंने नंगे पांव घूम-घूमकर लोगों की सेवा की। अपना जीवन परमार्थ और जनसेवा को समर्पित करने वाले इस व्यक्तित्व को प्रकृति ने हुनर और वरदान दोनों से नवाजा लेकिन कभी उनके मन में न लालच आया और न कभी सुख-सुविधाओं की चाहत। अपने परिवार के भरण पोषण के लिए पूर्णत: खेती पर आश्रित आदिवासी किसान ने जड़ी-बूटी के जानकार होने एवं पुरखों से मिले हुनर और विरासत को सहेजते हुए हजारों लोगों का उपचार किया वह भी नि:शुल्क। अपनी मेहनत, ईमानदारी और सेवा के संस्कार से ही आदिवासी कृषक पिता ने अपने चार बेटों को इतना काबिल बनाया दिया है कि जिले में लोग उनकी मिसाले देते है। समाज में इनका नाम और प्रतिष्ठा है और ये बेटे कहते है कि आपके ही नाम से पहचाने जाते है बाबूजी। आज फादर्स-डे पर असाड़ी निवासी प्रकृति से जुड़ी शख्सियत मुन्ना सिंह धुर्वे के संघर्ष और परोपकार की कहानी जानिए परिधि में उनके बेटे जिले के प्रतिष्ठित मेडिटेक कॅरियर इंस्टीट्यूट बैतूल के संचालक एमबीबीएस डॉक्टर राजा धुर्वे की जुबानी-
बीमार-पीडि़तों के उपचार के लिए नंगे पैर मीलों तक चले बाबूजी

डॉ राजा धुर्वे बताते है कि बैतूल जिले के आदिवासी बाहुल्य चिचोली क्षेत्र के छोटे से गांव असाड़ी उनका पैतृक गांव है। उनके पिता मुन्ना सिंह धुर्वे मूल रुप से जड़ी बूटियों के जानकार थे और इस अनुभव के कारण वे आदिवासी क्षेत्र में गरीब एवं जरुरतमंदों का उपचार किया करते थे। लोगों की सेवा के लिए वे मीलों तक नंगे पांव भी चले लेकिन कभी उनके माथे पर किसी ने एक शिकन नहीं देखी। परिवार खेती पर आश्रित था, पिता चाहते तो उपचार के लिए शुल्क ले सकते थे, लेकिन उन्होंने अपने हुनर को हमेशा प्रकृति और पूर्वजों की देन समझा और बिना किसी से एक रुपए लिए उपचार किया। डॉ राजा बताते है कि वे चार भाई है, पिताजी ने चारों को शिक्षित करने और उन्हें काबिल बनाने में अपना पूरा जीवन झोक दिया। बच्चों की परवरिश के लिए उन्होंने कभी अपने खेतों में तो कभी दूसरों के खेतों में जी तोड़ काम किया। इससे होने वाली आय को उन्होंने अपने चारों बेटों की शिक्षा पर खर्च किया। स्वयं अभाव में रहे, लेकिन बच्चों की ख्वाहिशों से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। पिता की मेहनत, परोपकार, संस्कार को देखकर सभी बच्चों ने भी पूरी निष्ठा से शिक्षा प्राप्त करने के बाद पिता के कंधों को मजबूत किया। डॉ धुर्वे ने बताया कि उनके पिता से मिली सीख और संस्कार की वजह से ही आज उनका बड़ा बेटा पुश्तैनी खेती संभाल रहा है, एक बेटा जीन के शासकीय स्कूल में शिक्षक तो एक पटवारी के पद पर कार्यरत है। डॉ राजा धुर्वे का भी जिले में अलग पहचान और मुकाम है। प्रसिद्ध मेडिटेक कैरियर इंस्टीट्यूट का संचालन करते हुए वे लगातार गरीब जरूरतमंद बच्चों का भविष्य संवार रहे हैं।
हजारों गरीब-आदिवासी बच्चों के पथ प्रदर्शक राजा

राजा धुर्वे ने मध्यप्रदेश के शासकीय बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज सागर से एमबीबीएस करने के बाद, स्नातकोत्तर की पढ़ाई ना करते हुए दूसरे बच्चों का भविष्य संवारने का बीड़ा उठाते हुए मेडिटेक कैरियर इंस्टीट्यूट की स्थापना की उनके इंस्टीट्यूट से नर्सिंग, नीट की पढ़ाई करके हजारों छात्र-छात्राओं को सफलता मिली। राजा धुर्वे बताते हैं कि पिता की सीख को याद रखते हुए उन्होंने हमेशा सेवा और शिक्षा को प्राथमिकता दी। आज भी उनके पिता मन्ना सिंह लोगों का उपचार कर उन्हें उनकी पीड़ा हरते है। एक समय ऐसा भी था जब वह अभावों से जूझ रहे थे, परंतु उन्होंने हम बच्चों को इसका अहसास तक नहीं होने दिया और अकेले ही परेशानियों से जूझते रहे। ऐसे ही मां को धरती और पिता को आकाश नहीं कहा जाता। डॉ राजा कहते है कि आज पिता के आशीर्वाद और ईश्वर की कृपा से उनका परिवार सम्पन्न और सुखी है लेकिन इस सफलता के पीछे उनके पिता का त्याग ही है जिसे वह कभी विस्मृत नहीं कर सकते। पिता से मिली सीख को शिरोधार्य कर अनुसरण करने वाला कोई भी बेटा कभी विफल नहीं हो सकता यही सीख आज राजा अपने हजारों छात्रों को देते है।