PARIDHI NEWS GOSSIP:लंच टाईम के बाद बात, वीक एंड में मुलाकात..!
लंच टाईम के बाद बात, वीक-एंड में मुलाकात..!

इन दिनों प्रथम श्रेणी के एक साहब, लंच टाईम में मोबाईल पर वार्तालाप को लेकर खासा सुर्खियों में है। यूं तो साहब का रुतबा कुछ खास है नहीं लेकिन वह अपनी वाकपटुता से सबको अपना मुरीद बनाने में माहिर जरुर है। इनके कारनामों की चर्चा जिले में आमद देते ही शुरु हो गई थी। 50 के आकड़े से विशेष प्रेम रखने वाले साहब के लिए उनका ही महकमा कहता है, कि साहब का मिजाज चमड़ी जाये पर दमड़ी न जाए वाला है। जब से साहब का आदिवासी जिले में पदार्पण हुआ है, वह लंच टाईम के बाद करीब एक घंटा तक चैम्बर में होकर भी अपनी ब्हील सीट पर नहीं होते। अलबत्ता चैम्बर के साईड में बने एक कक्ष में मोबाईल पर उनका लम्बा वार्तालाप चलता है। इस वार्तालाप को उन्होंने ऑफिशिल टॉक विद सीनियर्स का नाम दे रखा है।

उनके कुछ करीबी कहते है कि साहब के दो कनेक्शन भोपाल और खंडवा में है, जिसको मैनेज करने की ही टेंशन उन्हें रहती है। उनकी पूरी कोशिश भी रहती है कि एक को मनाने और दूसरे के रुठने की नौबत कभी आए न। वैसे भोपाल और खंडवा से उनका गठजोड़ भले न हो, लेकिन इन दोनों शहरों में उनका किस्मत कनेक्शन जरुर है। इन दिनों अपनी किस्मत वह जिले के प्रसिद्ध हास्पीटल वाले कस्बे में भी आजमा रहे है। एक और खास बात यह है कि साहब अपना पैटर्न कभी नहीं बदलते, यदि मुख्यालय पर है तो यह तय है कि लंच टाईम के बाद अपने चैम्बर से सटे कक्ष में कॉल पर लम्बी गॉसिप का दौर चलेगा ही चलेगा। खंडवा और भोपाल को बारी-बारी मैनेज करने के बाद बचे समय में साहब बैतूल का भी काम निपटाने की कोशिश करते है। चर्चा है कि साहब का घर से ज्यादा आकर्षण खंडवा और भोपाल से है इसलिए वीक एंड में वे कभी खंडवा, तो कभी भोपाल का रुख करते है। बाकी दिनों में लंच के बाद वार्तालाप चलता रहता है। एक गठजोड़ और ढाई सेटिंग वाले साहब भले ही खर्च करने के मामले में कंजूस हो लेकिन अपनी कनेक्शन्स का ख्याल रखने में माहिर है। टेबल पर रखी फाईलों को चर्चा के बाद निपटाने में भरोसा करने वाले साहब की काम के प्रति ईमानदारी भी 50 के आकड़े तक ही सीमित है। इसके लिए बाकायदा उनकी तिकड़ी भी काम करती है। चालीस खर्च करने के बाद मिली कुर्सी से बार-बार पचास वसूलने में उनकी तिकड़ी के दो प्यादे भी 4-5 के लालच में शतरंज के मोहरे बने हुए है। राजनीति के मामले में भी साहब का भरोसा बैतूल से ज्यादा खंडवा के दिग्गज जनप्रतिनिधि पर है जिनके तथास्तु से ही साहब बैतूल में खेला कर रहे है। विभाग के हिसाब से उनकी कार्य शैली और रीति-नीति को लेकर उन्हीं के मुरीद कहते है कि न जाने कितने गए होंगे तब कहीं जाकर इन एक की आमद हुई। संभवत: बैतूल में पहली बार ऐसे साहब को पाकर अधीनस्थ महकमा भी हैरान है। अपनी मंशा पूरी करने के लिए दबाव बनाने और बिसात बिछाने में माहिर इन साहब ने आगमन के 6 महीनों में ही नुकसान की भरपाई 50-50 के प्रेम से कर ली है। मूल से दस गुना ब्याज भी साहब की झोली में है..अब तो लोग चाह रहे है कि चारागाह का पूरा चारा खत्म हो इसके पहले ही इनकी रवानगी उन्हें चाहने वालों के पास कर ही देनी चाहिए…तो फिर सरकार चाहे खंडवा भेजो या भोपाल पर कर ही दो बैतूल से विदाई।