आंकड़ों में हरियाली की खोज..!

नागपुर 45°, अहमदाबाद 44°, प्रयागराज 43° और अपना बैतूल भी 42°
यह गर्मी नहीं है। यह नीति का तापमान है।यह उस देश का तापमान है जिसने अपने जंगलों को काटकर खुद को भट्टी में बदल दिया और फिर आंकड़ों में हरियाली खोजने लगा।हमसे कहा गया कि भारत हरा हो रहा है। लेकिन सच यह है कि भारत हरा नहीं, खोखला हो रहा है।समस्या पेड़ों की नहीं है, समस्या उस झूठ की है जिसने पेड़ों को जंगल बना दिया।जब आपने आम के बाग को जंगल कहा, जब आपने यूकेलिप्टस की कतारों को फॉरेस्ट कवर में जोड़ दिया, उसी दिन आपने असली जंगलों की मौत पर पर्दा डाल दिया।और फिर शुरू हुआ असली खेल।Ease of Doing Business के नाम पर कानून बदले गए। जिन नियमों का काम जंगल बचाना था, उन्हें “बाधा” कहा गया।जिन प्रक्रियाओं का काम स्थानीय लोगों को बोलने का अधिकार देना था, उन्हें “देरी” कहा गया।नतीजा साफ था।क्लीयरेंस तेज हुई, सवाल कम हुए, और जंगल गायब होने लगे।EIA 2020 ने इस खेल को खुला कर दिया।अब आप पहले जंगल काट सकते हैं, बाद में अनुमति ले सकते हैं।यानी अपराध अब प्रक्रिया का हिस्सा है।Forest Conservation Amendment Act 2023 ने अंतिम चोट मारी।अब जंगल वही है जो सरकारी कागज में है।
जो जमीन असल में जंगल है लेकिन रिकॉर्ड में नहीं, वह अब जंगल नहीं है।यानी कानून ने आंख बंद कर ली और कहा,जो दिख रहा है, उसे मत देखो, जो लिखा है वही सच है। इसका मतलब क्या है? इसका मतलब यह है कि लाखों हेक्टेयर जमीन, जो अब तक जंगल थी, अब सिर्फ एक “एसेट” है—खनन के लिए, सड़कों के लिए, प्रोजेक्ट्स के लिए और यह कोई सैद्धांतिक बात नहीं है। छत्तीसगढ़ का हसदेव अरण्य इसका जिंदा उदाहरण है।जहाँ घने जंगल, हाथियों के रास्ते और आदिवासी जीवन,सबको कोयले के नीचे दबा दिया गया।अरावली इसका दूसरा चेहरा है। दिल्ली की प्राकृतिक ढाल, जो गर्मी को रोकती थी, उसे खनन और निर्माण ने तोड़ दिया। आज वही दिल्ली धूल और गर्मी में घुट रही है और ग्रेट निकोबार जहाँ हजारों हेक्टेयर वर्षावन को एक मेगा प्रोजेक्ट के लिए दांव पर लगा दिया गया है।जहाँ भविष्य को वर्तमान की कीमत पर बेचा जा रहा है। यह अलग-अलग घटनाएँ नहीं हैं। यह एक ही नीति का अलग-अलग भूगोल में दोहराया गया पैटर्न है।पहले जंगल को कम महत्व का घोषित करो। फिर कानून को आसान बनाओ। फिर क्लीयरेंस तेज करो। और अंत में जनता को एक कहानी सुना दो।वही कहानी जो आज हर जगह सुनाई जा रही है—एक पेड़ माँ के नाम। यहाँ सबसे बड़ा धोखा छिपा है। क्योंकि एक पौधा लगाना और एक जंगल बनाना दो अलग चीजें हैं। एक फोटो बनाता है, दूसरा पारिस्थितिकी। जब लाखों पेड़ काटे जा रहे हों और उसी समय लोगों से कहा जाए कि वे एक पौधा लगाकर अपना कर्तव्य पूरा कर लें,तो यह पर्यावरण नीति नहीं, यह नैरेटिव मैनेजमेंट है।यह वही तरीका है जिसमें समस्या को हल नहीं किया जाता, बल्कि उसका भावनात्मक विकल्प दे दिया जाता है।और जब तक लोग उस विकल्प में उलझे रहते हैं, असली काम चलता रहता है।जंगल कटते रहते हैं।जमीन बदलती रहती है।तापमान बढ़ता रहता है।फिर एक दिन आप 45°C में खड़े होते हैं और सोचते हैं कि यह सब अचानक कैसे हो गया।यह अचानक नहीं हुआ।यह धीरे-धीरे, योजनाबद्ध तरीके से हुआ है।जंगल इस देश का प्राकृतिक कूलिंग सिस्टम थे। वे नमी को रोकते थे, हवा को ठंडा रखते थे और चरम तापमान को संतुलित करते थे। जब वे हटे, तो गर्मी आई। जब वे टूटे, तो मौसम बदला। जब वे खत्म हुए, तो शहर भट्टी बन गए।आज भारत जल रहा है क्योंकि भारत ने अपने जंगलों को जलने दिया और सबसे खतरनाक बात यह है कि यह सब विकास के नाम पर हुआ।विकास अगर आपको सांस लेने की क्षमता से वंचित कर दे, अगर वह आपके मौसम को असहनीय बना दे, अगर वह आपके भविष्य को खतरे में डाल दे,तो वह विकास नहीं, विनाश है।अब सवाल सीधा है। क्या हम अभी भी पेड़ गिनेंगे या जंगल बचाने की बात करेंगे,क्योंकि अगर हमने यह सवाल अभी नहीं पूछा तो आने वाले सालों में तापमान ही जवाब देगा!साभार🙏
