तीसरी तक नहीं भाएं स्वर-व्यंजन पर ह से हलवा और पिता की सख्ती बन गए सीख
➡️तीसरी तक नहीं भाएं स्वर-व्यंजन पर ह से हलवा और पिता की सख्ती बन गए सीख
➡️नगर पालिका सीएमओ नवीन पाण्डेय ने बताए पिता के साथ रोचक संस्मरण
परिधि फादर्स डे विशेष

पिता अनुशासन का वह स्तंभ है जो जीवन को सही आकार देता है, उनकी सख्ती में छिपी सीख भविष्य के संघर्षों के लिए हमें मजबूत बनाती है। सच ही है कि पिता पालन है, पोषण है, परिवार का अनुशासन है, पिता धौंस से चलने वाला प्रेम का प्रशासन है। उक्त बाते नगर पालिका बैतूल के सीएमओ नवीन पाण्डे ने कहीं।

श्री पाण्डे कहते है कि उनके पिता का अनुशासन और सख्ती ही उनके वजूद और सफलता का सोपान है। उन्होंने बताया कि वैसे तो हमेशा मां के नजदीक रहे, पिताजी श्री शिव कुमार पाण्डेय वन विभाग में पदस्थ रहे इसलिए ज्यादातर समय बाहर ही बीतता था। जब कभी वह घर लौटते थे तब हमारे लिए परीक्षा की घड़ी होती थी। नवीन पांडे कहते है कि वैसे तो पिता के साथ बिताया हर लम्हा प्रेरणास्पद होता है। परिधि न्यूज के साथ उन्होंने अपने दो संस्मरण साझा किए जिसने उनके जीवन को मकसद दिया और जीवन के संघर्षों से लडऩे की प्रेरणा भी।
जब “ह” से “हल”नहीं “हलवा” बन गया मुसीबत

नवीन बताते है कक्षा तीसरी तक भी उन्हें स्वर और व्यंजन का पूर्ण ज्ञान नहीं था। मां के इर्द-गिर्द ही उनका पूरा वक्त बीतता था और मां ही उनकी सबसे बड़ी रक्षक भी रही। स्कूल जाना उन्हें भाता नहीं था, यहीं वजह थी कि कक्षा तीन तक भी उन्हें स्वर-व्यंजन याद नहीं थे। एक बार जब पिताजी ड्यूटी से लौटे और उन्हें पढ़ाने बैठे तो उनकी गाड़ी ह से हल पर अटक गई। दरअसल नवीन को मां के हाथ का हलवा बहुत पसंद था और जब डिमांड करों मां उनके लिए हलवा बना भी देती थी। जब पिताजी ने ह से हल पढ़ाया तो नवीन ह से हलवा दोहरातें। पिताजी ने दो बार गलती सुधारने का मौका दिया, लेकिन तीसरी बार भी जब ह से हलवा कहा तो पिताजी का हाथ तेजी से छूटा और सीधा गाल लाल, उसके बाद से हलवा से वा ऐसे गायब हुआ कि जीवन का हल मिल गया, इस घटनाक्रम के बाद नवीन अपनी शिक्षा के प्रति गंभीर हुए और इसके बाद हमेशा अपनी क्लास और स्कूल में टॉपर रहे।
पिता के समर्पण और त्याग से मिली सीख ने बनाया काबिल

कक्षा 12वी का संस्मरण साझा करते हुए सीएमओ नवीन बताते है कि उन्होंने कक्षा हायर सेकण्डरी स्कूल परीक्षा में गणित विषय से न्यू बैतूल स्कूल से टॉप किया था। उस वक्त बड़ी बहन की शादी नहीं हुई थी, बड़े भाई इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे। पिताजी ने जमापूंजी तीनों भाई बहन की शिक्षा पर खर्च कर दी थी। नवीन बताते है कि उन्होंने हमेशा पिता का समर्पण और त्याग देखा है, जब पिताजी ने कहा कि मनचाहा विषय लेकर आगे की पढ़ाई करों चाहे मुझे खुद को गिरवी भी रखना पड़े तो मैं पीछे नहीं हटूंगा, बच्चों की पढ़ाई पूरी होनी चाहिए, तब नवीन ने पिता पर और अधिक बोझ न बनने का सोचकर साधारण पढ़ाई चुनी और बीए किया। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की और आज इस मुकाम पर है। उनके बड़े भाई चन्द्रशेखर पाण्डेय असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ पुलिस भोपाल के पद पर सेवाएं दे रहे है। नवीन कहते है कि पिता हताश होने पर भी बच्चों को कभी बताते नहीं है अपितु उनका विश्वास ही बनते है, लेकिन बच्चों की अपनी जिम्मेदारी भी होती है कि वह पिता को समझे। परिवार सुख-दुख का ताना बाना है और पिता छोटे से परिंदे का बड़ा सा आसमान है।