PARIDHI GOSSIP NEWS:साहेब हजारी…!
साहेब हजारी…!

परिधि चटकारा बैतूल
अपने बैतूल को लेकर कुछ समय पहले तक कहा जाता था कि यहां नौकरी में सुकून है, जो भी साहेब यहां आते थे, वह यही रुक जाना चाहते थे और कई तो रुक भी गए हमेशा के लिए। इसके पीछे वजह सुकून ही थी,लेकिन अब लूट सके तो, लूट वाली कहावत यहां ज्यादा जंचती है। यही वजह है कि अब जो भी यहां आता है वह बस लूटने में लगा रहता है। इस सब के बीच पड़ोसी जिले में सेवा जोहार और राजधानी से अदब-आदाब रखने वाले कमाऊ विभाग के साहब एक बार फिर याद आ गए। इन साहब का मेंटनेस गजब का है। घर, पड़ोस और राजधानी को मेंटेन करने के साथ-साथ और भी पुराने रिश्तों को उन्होंने सचल दूरभाष यंत्र के माध्यम से बांधे रखा है, इसी वजह से उनका सचल दूरभाष यंत्र हर प्रहर व्यस्त रहता है। वैसे तो ये साहब बात-बात पर वह कुछ ऐसी ही डींगे हांकते है कि ऐसे ही थोड़े न कुर्सी मिली है, हमने भी एमपीपीएससी कैश की है। सनातनी परिवार के इन सपूत की काबलियत के किस्से वह जहां जाते है उससे पहले वहां पहुंच जाते। करीब साल भर पहले बैतूल आए साहब इन दिनों अपनी जमीन और बैतूल में अपनी जड़े कितनी फैली है इसकी तलाश में है। पड़ोस के जिले में इनके कारनामे प्रशासनिक गलियारों में चटकारे लेकर सुनाए जाते है। घर के अंदर अपनी मेडम से खौफ खाने वाले साहब बाहर राजधानी वाली बेगम से दुआ सलाम लिए बैठे है। इनके लालच और कुटिलता का कोई अंत है ही नहीं। नोटिस-नोटिस खेलने में माहिर साहेब का पिछले जिले में एक हजार सो कॉज नोटिस अधीनस्थ कर्मचारियों को देने का रिकॉर्ड रहा है। खराब आदतें भला जल्दी कहा सुधरती है बैतूल आने के बाद भी थोकबंद नोटिस देने की साहब की आदत सुधरी नहीं है। नोटिस वाले साहब को अब जिले के माननीय से लेकर आला अधिकारी भी नोटिस करने लगे है। पिछली पोस्टिंग वाले जिले के इनके कारनामों की जांच रिपोर्ट उजागर ही नहीं हो पाई है, रिपोर्ट पर तीन जांच अधिकारियों के हस्ताक्षर भी है और बड़े साहब ने और परीक्षण की टिप्पणी भी रिपोर्ट पर लिखी थी लेकिन उसके बाद किसी ने रिपोर्ट देखी ही नहीं और अब चार दफ्तर खंगालने के बाद भी रिपोर्ट मिल नहीं रही है। जांच रिपोर्ट जमीन खा गई या आसमान निगल गया या दीमक चट कर गए और बैतूल वालों के लिए चटकारा छोड़ गए यह बड़ा सवाल है। अब यह तो साहब ही जाने,, कि उस रिपोर्ट को किसकी कृपा दृष्टि से अदृश्य करवा दिया। ताना-बाना बुनने में बैतूल में भी साहब कमतर नहीं है यहां भी उनका अपना प्रिय मदन गोपाल है। यहां आते ही पेटी और खोके की धाक और धमक जमाकर बैठे साहब के खिलाड़ी तबादलों की फील्ड पर फिर से सक्रिय हो गए है। कौन रहेगा-कौन जाएगा, कौन कहां एडजस्ट होगा इसके लिए खिलाड़ी पिच पर बैटिंग के लिए उतर चुके है। 15 दिन के टूर्नामेंट में शतक लगाने, मैन ऑफ दी मेच और चैम्पियन बनने के लिए 11 सदस्यीय टीम साहब के जूते पॉलिश करने में जुट गई है, साहब के त्रिदेव हर मैच के लिए बाकायदा विज्ञापन बटोरने और उसमें अपना-अपना कमीशन सेट करने की जुगत भिड़ा रहे है। इधर घर की बातें बाहर न जाए और तीसरा कौन यह किसी को पता न चल जाए इसलिए साहब ने अपने दोनों सारथियों से भी दूरी बना ली है। साहब अब अपनी नैया के खेवणहार खुद ही बन गए है। शाम की बैठकों का दौर कम कर एकांतवास प्रिय होने का दिखावा कर रहे साहब को विभाग का एक-एक व्यक्ति सूरत और सीरत दोनों से पहचानने लगा है, इसके अलावा प्रशासनिक महकमें में भी उनके कारनामें चटकारा लगाकर सुने-सुनाएं जाकर ठहाके लगाए जा रहे है। खासतौर से उनकी राजधानी वाली बेगम को लेकर लोगों ने उन्हें सुबह राम-राम, शाम को दुआ-सलाम वाले साहब कहना शुरु कर दिया है।
