PARIDHI GROUND REPORT 8: पति-पत्नी चला रहे दो विभाग के तीन छात्रावास
✓लड्डू रखने के लिए अब बचे ही नहीं हाथ
✓सहायक आयुक्त प्रभार देने नहीं मिला कोई योग्य शिक्षक
✓अधीक्षकों के प्रभार और नियुक्ति को लेकर सुर्खियों में जिले का ट्राइबल विभाग

आदिवासी जिले में आदिम जाति कार्य विभाग के साथ-साथ जिला शिक्षा केन्द्र द्वारा संचालित छात्रावासों में भी गजब की सांठ-गांठ चल रही है। यहां अधीक्षक 12-12 साल से नहीं बदले गए है, जबकि तीन साल में ही अधीक्षकों को स्थानांतरित किये जाने के निर्देश बार-बार राज्य शिक्षा केन्द्र द्वारा दिए गए है। संभवत: बैतूल एक मात्र ऐसा जिला है जहां अधीक्षिकों को हटाने के आदेश जारी होने एवं नए अधीक्षक नियुक्त किए जाने के बाद भी अब तक पुराने अधीक्षकों के हाथों में ही कमान है। राजनीतिक रसूख के चलते तो कभी अधिकारियों के साथ सांठ-गांठ की वजह से जिले में अधीक्षक बरसों-बरस छात्रावासों में टिके हुए है। यही नहीं शिक्षक पति-पत्नी की काबलियत भी विभाग पता नहीं कौनसे पैमाने पर परखते है कि उन्हें अधीक्षिक नियुक्त कर देते है। जिला मुख्यालय पर एक और ऐसा ही मामला देखने सामने आया है, जहां शिक्षक पति को पोस्ट मैट्रिक बालक आदिवासी छात्रावास पुलिस ग्राउंड के पास का अधीक्षक बनाया गया है, वहीं इसी अधीक्षक की काबलियत पर भरोसा करते हुए सीनियर आदिवासी बालक छात्रावास का भी प्रभार उन्हें सौंप दिया गया। इधर अधीक्षक की पत्नी भी12 वर्षों से अधीक्षिका है। गौरतलब है कि इतने वर्षों तक यदि एक अधीक्षक को छात्रावासों में अटैच रखा जाएगा तो क्या उन्हें पढ़ाना याद रहेगा, जबकि उनकी मूल पदस्थापना शिक्षक के रुप में ही है। अब तक दो और चार हाथ में लड्डू तो समझ आ रहा था लेकिन दो लोगों के छह हाथ तो संभव नहीं है, लेकिन शिक्षा तंत्र के पास ऐसा कोई मापदंड नहीं है। जिसमें लड्डू कितने हाथों में कितने रखने है यह तय किया जा सकें।
दंपत्तियों पर भरोसे का आखिर क्या है राज?
संभवत: जिला शिक्षा केन्द्र और आदिम जाति कार्य विभाग के पास योग्य शिक्षकों का अभाव है, जिसकी वजह से जिसकी वजह से वे लम्बे समय तक मलाईदार पदों पर एक ही शिक्षक या शिक्षिका को लम्बे समय तक काम करने का मौका दे रहे है फिर वह अवधि 12 साल जितनी लम्बी ही क्यों न हो। प्रतीत होता है जिला शिक्षा केन्द्र और आदिम जाति कार्य विभाग द्वारा भी सांठ-गांठ से काम किया जा रहा है। इसके अलावा छात्रावास संचालन भी एक पैटर्न पर किया जा रहा है। जिला मुख्यालय पर ही एक और ऐसा उदाहरण सामने आया है जिसमें पति और पत्नी अलग-अलग विभाग के अलग-अलग छात्रावासों का संचालन कर रहे है। जिला शिक्षा केन्द्र द्वारा सदर क्षेत्र में संचालित 100 सीटर नेताजी सुभाषचन्द्र बोस कन्या छात्रावास की अधीक्षिका प्रीति फाटे 12 वर्षों से अधीक्षक के पद पर ही है इसकी पुष्टि भी जिला शिक्षा केन्द्र के एपीसी राजेश तुरिया ने की है। वहीं दूसरी ओर प्रीति फाटे के पति पवन फाटे पर सहायक आयुक्त की कृपादृष्टि है। पवन फाटे को जन जाति कार्य विभाग द्वारा पोस्ट मैट्रिक आदिवासी बालक छात्रावास का अधीक्षक नियुक्त किया गया है। साथ ही कुछ दिनों पहले उन्हें सीनियर आदिवासी बालक छात्रावास का भी प्रभार सौंप दिया है। इसके पूर्व भी एक और मामला जिला मुख्यालय का ही परिधि न्यूज ने प्रमुखता से प्रकाशित किया था, जिसमें आमढ़ाना की शिक्षिका ललिता राक्से को 400 सीटर छात्रावास का अधीक्षक बनाने एवं उनके पति कमलेश राक्से को बालक छात्रावास हमलापुर का अधीक्षक नियुक्त करने, तथा पत्नी के छात्रावास में पति अधीक्षक के नियंत्रण का खुलासा किया था। पति-पत्नि की जोड़ी को अधीक्षक बनाने के पीछे विभागों की मंशा समझ से परे है। गौरतलब है कि छात्रावासों में अधीक्षकों को बच्चों के साथ ही रात में रहने के निर्देश है, लेकिन जिला मुख्यालय के छात्रावासों में भी रात में ही अधीक्षकों के घर लौट आने की परम्परा वर्षो से रही है।
AC कहेेंगे अलग-अलग एम्लाई है दे सकते है प्रभार
जनजातीय कार्य विभाग के सहायक आयुक्त द्वारा राक्से दम्पत्ति को अधीक्षक नियुक्त किए जाने के संबंध में यह कहकर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लिया था कि पति और पत्नी अलग-अलग एम्लाई है इसलिए उन्हें प्रभार दिया जा सकता है। इस मामले में भी उनका यही जवाब हो सकता है, लेकिन यहां एक सवाल और है कि पति पत्नी तीन-तीन छात्रावास संभाल रहे है, इतनी योग्यता की भला किस पैमाने पर परखी जाती है। जिले के जनप्रतिनिधियों से लेकर वरिष्ठ अधिकारियों को भी छात्रावासों में हो रहे खेल की जानकारी है, लेकिन सभी की चुप्पी कहीं न कहीं बच्चों के अहित का कारण बन रही है।