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यात्रा वृतांत: बाबा तू ना संभाले तो हमे कौन संभाले…

बाबा तू ना संभाले तो हमे कौन संभाले …

✍️राजेश आहूजा,बैतूल

यात्रा वृतांत परिधि

बैजनाथधाम की 110 किमी की पैदल यात्रा का वृतांत

सावन में भोलेनाथ के दर्शन को जाने वाले सभी कांवड़ियों को कहा जाता है कि कवाड़िया नहीं चलता उसे तो कावड़ चलाती है।यह पक्तिया पूर्णतः सत्य है क्यों कि मैं 1 अगस्त 2026 को में फिर बाबा धाम देवघर ( झारखंड ) जा रहा हूँ। वैसे तो मेरी ये चौथी यात्रा है। पहली कावड़ यात्रा में सुल्तानगंज से गंगा जल भरकर टैक्सी से बाबाधाम गया था और उसके बाद तीसरी बार पैदल कावड़ लेकर जाऊँगा। मेरी मान्यता है कि मुझे बाबा बुलाते है, इसीलिए पहुँच पाता हूँ। अन्यथा मेरी सामर्थ नहीं की मैं वहाँ पहुँच पाऊ , लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि बाबा जब भी किसी को बुलाते है तो सँभालकर ले जाने और वापस घर पहुँचाने का इंतज़ाम भी पहले ही करवा देते हैं। ऐसा मेरे साथ भी हुआ पिछले 32-35 वर्षों से बैतूल से लगातार जा रहे अपने भक्तों को बाबा ने मुझे अपने साथ संभालकर ले जाने की जवाबदारी दे रखी है और वो बाबा के भक्त है बबलू राजेश अग्रवाल और हरिओम अग्रवाल। सहज, सरल और शांत स्वभाव के ये दोनों बाबा के भक्त पूरी यात्रा में मेरे साथ- साथ सभी का ध्यान रखते है। यही कारण है कि मेरी तीसरी पैदल यात्रा पर भी इन्ही बाबा भक्तों के भरोसे मैं जा रहा हूँ।
110 किलोमीटर की पैदल यात्रा सभी भक्तों के साथ पूरे ही विधि विधान से पूरी की जाती है।अपने पूरे दैनिक उपयोग के समान के साथ जमीन पर सोना, फिर चाहे पैरो दर्द हो या छाले यात्रा के नियमों का पालन करते हुए सुल्तानगंज से उत्तरवाहिनी माँ गंगा का पावन पवित्र जल अपने अपने कावड़ में भरकर पूरी श्रद्धा एवं शुद्धता के साथ बोल बम का उद्घोष और पंडित जी से संकल्प करवाकर यात्रा शुरू की जाती है। जब कंधे पर कावड़ को उठाते हैं तब ऐसा लगता है कि बाबा भोलेनाथ अब हमारे मन और शरीर के साथ चलेंगे। यही कारण है कि सुल्तानगंज से कावड़ उठाकर जब हम सभी पहला क़दम उठाते हैं तब ही हम अपने आप को बाबा के हाथों में सौप देते है क्यों कि अब जो होगा वो बाबा ही करेंगे। इसीलिए तो हर कावड़ यात्रा में कहा जाता है बाबा का भक्त कावड़ नहीं उठाता और ना ही चलाता है उसकी कावड़ तो बाबा ही उठाते है और बाबा ही चलाते है। जब बाबा साथ होते है तब भूख प्यास दर्द सब अपने आप भी चला जाता है। बाबा के “ बोल बम “ के जयघोष का मतलब, बाबा के शरण में। तू ही तू है मैं कुछ नहीं। यही भाव के साथ सभी कांवड़िये बढ़ते जाते है। इस भावना को मन में लिए की “ बाबा तू ना संभाले तो हमे कौन संभाले “ का यही भाव 110 किलोमीटर की यात्रा कब पूरी करा देता है पता ही नहीं चलता । देवघर का ये बैद्यनाथ धाम 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है।
हमारी पहले दिन की यात्रा शाम को प्रारम्भ होती है जो 10 कि मी चलकर रुक जाती है और फिर अगले दिन 20 कि मी और फिर उसके बाद सुबह शाम दोनों टाइम लगभग 20 -20 चलकर देवघर पहुँचना होता है। देवघर पहुँचने से पहले यात्रा के अंतिम पड़ाव की यात्रा शुरू होती है। झारखंड बिहार बॉर्डर के एक के गाँव इनावरण से जो कहने को तो गाँव है परंतु इस गाँव की प्रमुख पहचान पूज्य श्री नथमल अग्रवाल जी की धर्मशाला है। जिसकी शुरुआत आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र के घने जंगलों में दूर दराज से ड्रमो में पानी भरकर यहाँ लाकर कांवड़ियों को पानी पिलाने की सेवा से हुई थी। आज धर्मशाला एक विशाल रूप ले चुकी है।श्री नथमल अग्रवाल जी जो छत्तीसगढ़ बिलासपुर के रहने वाले एक व्यवसायी है , उनका पूरा परिवार पूरे श्रावण मास में यही रहकर यात्रियों की सेवा करता है। अभी इस सेवा का पूरा काम उनकी अगली पीढ़ी के श्री विनोद जी अग्रवाल और अनूप जी अग्रवाल देखते है। अभी भी उनका पूरा परिवार बच्चो सहित श्रावण मास में इनावरण में रहकर अपनी पूरी आत्मीयता और तन मन और धन के साथ कावड़ियों की सेवा करते हैं।मुझे पिछली बार श्री विनोद जी से और अनूप जी से मिलने का सौभाग्य मिला था। आप दोनों का कावड़ियों के प्रति भाव देखकर लगा की बाबा साक्षात यहाँ भी विराजते है। इतनी बड़ी धर्मशाला , इतना बड़ा खर्च , हजारों लोगो का रोज आना जाना और सभी की सेवा में पूरा परिवार अपने सभी साथियों और कर्मचारियों के साथ चेहरे पर मुस्कान लिए 24 घटे खड़ा है। अदभूत क्यों कि यहां भोजन ,डॉक्टर, दवाई, मसाज,पीने का शुद्ध पानी ये सब यहाँ उपलब्ध हैं। विनोद जी और अनूप जी के समर्पण के साथ की जा रही सेवा को नमन है।
यात्रा का अंतिम पड़ाव इनावरण से शुरू होता है। यहाँ से बाबाधाम की दूरी लगभग 45 किलोमीटर रहती जो दिलो की धड़कन बढ़ाने वाली होती है रह रहकर दिलों दिमाग में बाबा की छवि दिखने लगती है बाबा तक पहुँचने की जल्दी बारिश और कीचड़ के बीच कांवड़ियों की भीड़ धक्का मुक्की करते हुए बाबा धाम के करीब पहुँचने लगती है। इन सब की परवाह किए बिना कावड़िये बोल बम के उद्घोष के साथ बढ़ते ही जाते है और पाँचवे दिन अल सुबह बाबाधाम पहुंचकर पंडित जी द्वारा संकल्प पूर्ण करने की पूजा अर्चना की जाती हैं फिर इसके बाद बाबा के दर्शन को जाना होता है, जिसका कांवड़ियों को साल भर बड़ी बेसब्री से इंतज़ार रहता है। बाबा की एक झलक पाकर ही हम सब धन्य हो जाते है , लेकिन ये यात्रा बाबा धाम से 42 किलोमीटर दूर टैक्सी द्वारा बासुकीनाथ धाम पहुंचकर भगवान बासुकीनाथ जी पर गंगा जल चढ़ाकर ही पूरी मानी जाती है इसलिए इसे जुड़वा धाम भी कहा जाता है।
इस यात्रा का अनूठा और अजूबा रंग है जो सिर्फ़ यही देखने को मिलता है। यहाँ 24 घंटे में यात्रा पूरी करने वाले कावड़ियो को “ डाक बम “ के नाम से जाना जाता है। ये वो कावड़िये होते जो अपनी 110 किलोमीटर की यात्रा सिर्फ़ 24 घंटे में लगभग दौड़ते हुए पूरी करते है। सुल्तानगंज से देवघर बिना रुके । डाक बम कांवड़िये के लिए सरकार भी विशेष व्यस्था करती है। इन्हें पहले से ही अपना रजिस्ट्रेशन सरकारी संस्थाओं में करवाना होता है जिससे इन्हें यात्रा में और बाबा धाम दर्शन में सुविधा मिलती है। सरकार के पास इन कांवड़ियों की पूरी जानकारी होती है । डाक बम कावड़ियो की इस 24 घंटे की यात्रा में यात्रा मार्ग में चलने वाले सभी कावड़ियो का सभी कांवड़िये भी पूरा ध्यान रखते हुए इन्हें रास्ता देते हुए इनके साथ दौड़ते हुए खाने और पीने का सामान भी उपलब्ध करवाते हैं। यही इस यात्रा की खूबी है की यहाँ हर कावड़िया दूसरे की मदद को लेकर हमेशा तत्पर रहता है और हर शब्द के बाद सिर्फ़ बोल बम बोल बम बोलता रहता है 🙏

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