Betul and MP Latest News

तो महिलाओं को नौकरी पाने में दिक्कत होगी, उन्हें घर पर ही रहने के लिए कह सकते है, सुप्रीम कोर्ट ने ‘पीरियड लीव’ वाली याचिका पर सुनवाई से किया इनकार

✓तो महिलाओं को नौकरी पाने में दिक्कत होगी, उन्हें घर पर ही रहने के लिए कह सकते है, सुप्रीम कोर्ट ने ‘पीरियड लीव’ वाली याचिका पर सुनवाई से किया इनकार

नईदिल्ली/देशभर में कामकाजी महिलाओं और छात्राओं के लिए ‘मासिक धर्म अवकाश’ (Menstruation Leave) की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करने से मना कर दिया है. अदालत ने इस मामले में बेहद व्यावहारिक चिंता जताते हुए कहा कि इस तरह के प्रावधान को कानूनी रूप से अनिवार्य बनाने के नकारात्मक परिणाम भी हो सकते हैं.
देश भर में सभी कामकाजी महिलाओं और छात्राओं के पीरियड्स से जुड़ी तकलीफों के लिए अवकाश का प्रावधान बनाने को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इंकार किया है. मुकदमा सामने लाए जाने पर CJI जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर कोई कंपनी अपनी मर्जी से (पीरियड्स) इसके दौरान छुट्टी दे रही है तो बहुत अच्छी बात है.उन्होंने आगे कहा कि जैसे ही आप इस को कानून के तौर पर सख्ती से लागू करेंगे तो इसके दूसरे पहलुओं को भी ध्यान रखना पड़ेगा. अब जैसे हो सकता है कि महिलाओं को नौकरी पाने में दिक्कत हो. उन्हें सरकारी नौकरी, न्यायपालिका या बाकी नौकरियों में रखा ही न जाए.उन्होंने कहा कि उनका करियर ही बर्बाद हो जाए. ऐसे मे उन्हें कह दिया जाए कि वो घर पर ही रहें. इसके अलावा CJI ने याचिकाकर्ता से कहा कि आप पहले ही केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के सामने अपनी बात रख चुके हैं. सरकार को सभी पक्षों से बात करके एक पॉलिसी बनाने पर विचार करना चाहिए.
अदालत के फैसले की मुख्य बातें
➡️कोर्ट ने कहा कि देशभर में अनिवार्य मेन्स्ट्रुअल लीव लागू करना अदलत का काम नहीं है।
➡️न्यायालय ने केंद्र सरकार से कहा कि वह इस मुद्दे पर राज्यों और संबंधित पक्षों से चर्चाकरके नीति बनाने पर विचार करे।

➡️कोर्ट ने चिंता जताई कि अगर इसे अनिवार्य कर दिया तो कंपनियां महिलाओं को नौकरी देने से बच सकती हैं।
➡️अदालत ने इस मुद्दे पर सीधे आदेश देने से इनकार कर दिया।

middle post add

जस्टिस बागची ने कहा कंपनी की जिम्मेदारी भी समझिए। सुनवाई के दौरान बेंच में शामिल जस्टिस बागची ने कहा कि अधिकार मांगना अपनी जगह ठीक है लेकिन उस कंपनी के बारे में भी सोचना होगा जिसे महिला कर्मचारियों को अतिरिक्त पेड लीव देनी होगी।उन्होंने कहा कि किसी भी नियम का असर सिर्फ कर्मचारियों पर नहीं बल्कि संस्थानों और कंपनियों पर भी पड़ता है। इसलिए इस तरह के फैसले सोच समझकर लेने होते हैं।
याचिका में क्या कहा गया?
याचिकाकर्ता ने केरल और निजी कंपनियों का उदाहरण दिया। याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट एम आर शमशाद ने कहा कि केरल में स्कूलों में इस तरह की छूट दी जा रही है और कुछ निजी कंपनियां भी स्वेच्छा से मासिक धर्म के दौरान छुट्टी दे रही हैं।उन्होंने अदालत से कहा कि जैसे गर्भावस्था के दौरान अवकाश का प्रावधान है, वैसे ही मासिक धर्म के लिए भी छुट्टी का नियम बनाया जाना चाहिए और सभी राज्यों को ऐसा करने का निर्देश दिया जाना चाहिए। कानून बनने पर महिलाओं के करियर पर असर पड़ सकता है।

You might also like
Leave A Reply

Your email address will not be published.