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वंदेमातरम गीत की 150 वी जयंती: स्वतंत्रता संग्राम सैनानी परिवारो के सम्मान पर सवाल

वंदेमातरम गीत की 150 वी जयंती: स्वतंत्रता संग्राम सैनानी परिवारो के सम्मान पर सवाल

✍️हेमंत चंद्र दुबे बबलू, शब्द परिधि बैतूल

कलेक्टर का आदेश पढ़िए। किस स्वतंत्रता संग्राम सैनानी परिवार कार्यक्रम में आमंत्रित कर लिया गया? आदेश सिर्फ कागज़ पर है उनका परिपालन कही नहीं है। आखिर कौन पूछेगा कि आदेश होने के बावजूद स्वतंत्रता संग्राम सैनानी परिवारों को क्यों नहीं आमंत्रित किया गया? पूछने वाले जन प्रतिनिधियो ने क्या आंखों पर काली पट्टी बांध रखी हैं? एक किसी सरकारी कार्यक्रम में यदि जन प्रतिनिधियो को भूलवश नहीं बुलाया जाएं तो जमीन आसमान पाताल एक कर देते है लेकिन देश की आजादी के दीवाने स्वतंत्रता सेनानी परिवारों को यदि आमंत्रित नहीं किया जाएं तो जूं तक नहीं रेंगती! इस प्रशासन को केवल और केवल आदेश निकालते आता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो वन्देमातरम गीत के 150 वी जयंती मनाना प्रशासन के लिए एक बला सिर पर आन पड़ी हो , कैसे उससे पिंड छुड़ाया जाए , वन्देमातरम के कुछ शब्द मुंह में बुदबुदा लिए जाएं, और बात समाप्त की जाए। मार्च के अंतिम सप्ताह में प्रशासन के अधिकारियों की नजर और सोच में केवल आज बजट ही सिर पर सवार है, खर्च कहां किया जाएं , कैसे किया जाएं , कहां तालाब खोद दे, कहां मूंद दे, किधर जल रोक दे, किधर पहाड़ खोद दे, किधर गंगा को अवतरित कर धरती पर पुनः लेकर आ जाएं। प्रशासन की नज़र और सोच में 150 वर्ष पहले जब देश गुलाम था तब स्वतंत्रता संग्राम सैनानी इस गीत को गाते थे ठीक था, लेकिन अब स्वतंत्र भारत में इस गीत को उनके परिवारों के साथ मिलकर गाने क्या फायदा ? इसलिए उन्हें बुलाने का क्या औचित्य ? बस यही विचार जो स्वतंत्रता संग्राम सैनानी परिवारों को इस वंदे मातरम् गीत की 150 जयंती पर आयोजित प्रशासनिक कार्यक्रम से दूर किए हुए है। प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि बैतूल में किन्ह स्वतंत्रता सेनानी परिवारों को कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया है क्योंकि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परिवार के व्हाट शॉप ग्रुप में सभी सदस्यों ने बतलाया है कि किसी भी परिवार को इस कार्यक्रम की सूचना नहीं मिली है, फिर इस आदेश का क्या औचित्य! दुर्भाग्यपूर्ण और प्रशासन का व्यवहार सर्वथा निंदनीय है। किसी सोच के चलते ही सरकार ने स्वतंत्रता सेनानी परिवारों को कार्यक्रम में आमंत्रित करने के लिए सोचा होगा लेकिन बैतूल प्रशासन ने केवल आदेश निकालकर अपनी कर्तव्यों की इतिश्री कर ली। मेरा देश पहले अंग्रेजों का गुलाम था और आज वह सरकारों और प्रशासन का गुलाम है तब भी अंग्रेज उन्हें सम्मान देने के स्थान पर सजा सुनाते थे क्योंकि उन्हें स्वतंत्रता संग्राम सैनानियों के मुख से वंदे मातरम् ,भारत माता का जय घोष नागवार गुजरता था और आज भी स्वतंत्र भारत में लगता है प्रशासनिक अधिकारियों को स्वतंत्रता सेनानी परिवारों के साथ खड़े होकर वंदे मातरम् गीत गाने में भारत माता की जय बोलने में कष्ट होता हैं तब ही तो आदेश निकालने के पश्चात भी प्रशासन उन्हें आमंत्रित करने में अपनी तौहीन समझता है।
कल तक हम अंग्रेजों के गुलाम थे और आज हम सरकारों, राजनेताओं, प्रशासनिक अधिकारियों के गुलाम है, यही इस देश की असली कहानी है

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