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भारत में सम्मान दिए नहीं , बांटे और लिए जाते है 

शब्द परिधि बैतूल

भारत में सम्मान दिए नहीं , बांटे और लिए जाते है 

हेमंत चंद्र दुबे बबलू

वरिष्ठ खिलाड़ी बैतूल

भारत माता को आजाद करने वाले क्रांतिकारी, देश के खातिर प्राणों को न्योछावर कर देने वाले बलिदानी आज तक क्यों भारत रत्न, पद्म सम्मान से वंचित? यूरोपियन यूनियन से हुई ट्रेड डील मदर ऑफ आल डील्स नहीं, बल्कि गुलामी ऑफ मदर लैंड डील है।इस देश में सम्मान सोचकर, आंकलन कर, विश्लेषण कर आज से नहीं वर्षों से बांटे जा रहे है, और इसलिए प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जिन क्रान्तिकारियों ने देश की आजादी के लिए हंसते हंसते हुए अपने प्राणों को न्योछावर कर दिया , उनके नाम आज तक आजाद भारत की इन सूचियों में क्यों नहीं दिखाई देते है, जिन क्रान्तिकारियों ने फांसी के फंदे पर झूलते हुए वन्देमातरम, भारत मां के नारे से सातों दिशाओं को हिला दिया आखिर वे क्रान्तिकारी इन सम्मानों की सूची में क्यों नहीं दिखाई पड़ते है? आखिर इन महान विभूतियों क्रांतिकारियों के नामों पर विचार नहीं करने के क्या कारण है? क्या कोई कानूनी अड़चन है? क्या स्वतंत्र भारत की सरकारें इन क्रांतिकारियों को ठीक वैसा ही अपराधी समझ रही हैं जैसा अंग्रेजी हुकूमत समझती थी? सरकारों को स्पष्ट करना चाहिए कि जिन क्रान्तिकारियों ने देश भारत मां को आजाद करने में प्राणों की आहुति दी वे हमारी दृष्टि और अदृश्य सम्मान देने के नियमों के दायरे में नहीं आते है और भारत को बताना चाहिए कि वे कौनसे नियम है? आखिर 78 वर्षो में आज तक किसी आजादी के दीवाने , क्रांतिकारी का नाम इन सम्मानों की सूची में नहीं आ पाया। जब यह मुद्दा उठेगा या उठता है तो बड़े भावुक होकर सत्ता के ये सफेदपोश नेताओ का बयान सामने आयेगा वे हर सम्मान से ऊपर है, वे हमारे भगवान है तो नेताजी इस व्यक्तव्य को संवैधानिक व्यवस्था देते हुए संसद में एक पंक्ति का प्रस्ताव पारित करवा दीजिए कि जो भी क्रांतिकारी अंग्रेजों से भारत की आजादी के संघर्ष करते शहीद हुए , बलिदानी हुए वे भारत में दिए जा रहे सभी सम्मानों से ऊपर,हमारे भगवान है
सम्मान बांटते समय बाकी सब ध्यान में आ जाते हैं बस देश की आजादी के दीवाने क्रांतिकारी इन नेताओं के मानस पटल से अचानक विस्मृत हो जाते है, अन्यथा पुण्य तिथि पर , जयंती पर भाषण देते देते क्रांतिकारियों को याद करते बेचारे राज नेताओं की आंखों में से अविरल बहती आंसुओं की धारा को वे रोक नहीं पाते हैं, भाषणों में क्रांतिकारियों के जीवन का ऐसा गुणगान करेंगे जैसे धरती आबा बिरसा मुंडा की जगह इन्होंने ही अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन किया होगा, क्रांतिकारी मंगल पांडे को ऐसा याद करेंगे कि 1857 की क्रांति मंगल पांडे ने नहीं इन्हीं ने अंग्रेजों के खिलाफ की होगी, वीरांगना लक्ष्मी बाई के नाम पर रेलवे स्टेशन का नाम रखते हुए वीरांगना लक्ष्मीबाई को ऐसे याद करेंगे जैसे वीरांगना लक्ष्मीबाई अपने बेटे दामोदरदास को पीठ पर बांधकर घोड़े पर सवार ऊंचे पहाड़ से नहीं कूदी होगी , ये नेता ही कूदे होंगे।अल्फ्रेड पार्क में आजाद ने अपनी पिस्टल से अंग्रेजों पर गोली नहीं चलाई होगी इन नेताजी ने ही गोली चलाई होगी, शहीद ए आजम भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव ने वन्देमातरम, इंकलाब जिंदाबाद का नारा देते हुए फांसी के फंदे को नहीं चूमा होगा, ऐसा लगता है ये सम्मान बांटने वाले नेताओं ने ही फांसी का फंदा चूमा होगा। असफाकउल्लाह , ठाकुर रोशन सिंह, रामप्रसाद बिस्मिल फांसी के फंदे पर जाते हुए सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है , तारना नहीं गा रहे होंगे, ये सम्मान बांटने वाले नेता ही गुनगुना रहे होंगे। क्रांतिकारियों को याद तो ऐसा करेंगे कि अंग्रेज भी कांप उठे , लेकिन 26 जनवरी की परेड में व्यवसायिक समझौता करने के लिए ठीक वैसा ही रेड कार्पेट स्वागत करते दिखाई पड़ेंगे, जैसा कभी हमारे राजा महाराजा ने व्यापार करने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी का स्वागत कर उन्हें रेड कार्पेट स्वागत कर आमंत्रित किया था और हम गुलाम हुए , दृश्य बदले है, लेकिन हकीकत नहीं। आज यूरोपियन यूनियन के साथ हुई ट्रेड डील को mother of all deals कहा जा रहा है , लेकिन यह वास्तव में Gulami of mother land deal है।इसलिए उस समय भी क्रांतिकारी अंग्रेजों से लड़ते लड़ते शहीद हो गए और आज वे अपने हिस्से का सम्मान पाने के लिए संघर्ष कर रहे है जिसके वे हकदार है।उस समय वे अंग्रेजों के अत्याचार, गोलियों के शिकार हुए और आज वे स्वतंत्र भारत में सम्मानों की सूची में अपमान की। गोलियों के शिकार हो रहे है। क्या कारण है संसद भवन में आज तक किसी क्रांतिकारी का तेल चित्र नहीं अनावरित किया गया है, क्योंकि आज भी मेरे स्वतंत्र भारत की सरकारें अंग्रेजों को ही खुश करने में लगी हुई हैं, और इसलिए आज भी भारत में सम्मानों की सूची से क्रांतिकारी कोसो दूर है, क्योंकि अंग्रेजों को खुश रखना है, उनसे व्यापार करना है, तो उन्हें कैसे भारत रत्न घोषित कर सकते है, कैसे उन्हें पद्म भूषण, पद्म विभूषण सम्मान से सम्मानित कर सकते हैं, अंग्रेजों की नजरों में और कानून में वे अपराधी थे इसलिए आज भी वे सम्मानों की सूची से अपराधी ही समझकर बहिष्कृत और अपमानित किए जा रहे हैं।भले ही ये स्वतंत्रता के बलिदानी, क्रांतिकारी सरकारी सम्मानों के हकदार आज तक नहीं बन सके लेकिन करोड़ों भारतीयों के दिलों में वे श्रद्धा भाव से बसते है ,क्योंकि आज हम उन्हीं के बलिदान त्याग,समर्पण, तपस्या के कारण, भारतीय कहलाने के अधिकारी है, इसलिए उनके साथ होते अन्याय पूर्ण व्यवहार को देख दुःख नहीं गुस्सा आता है।

क्रमशः विचारों की यह श्रृंखला भारत में सम्मान दिए नहीं बांटे और लिए जाते है जारी रहेगी…
आग्रह: इसी विचार के तहत मैं अपने जिले के जो आदिवासी क्रांतिकारी जंगल सत्याग्रह में अंग्रेजों की गोली से शहीद हुए या जिन्हें अंग्रेजी हुकूमत ने फांसी पर लटका दिया उन्हें पद्म सम्मान से सम्मानित किया जाएं क्योंकि उन्होंने देश की आजादी के साथ साथ जल जंगल जमीन को बचाने के लिए जंगल सत्याग्रह आंदोलन करते हुए अपने प्राणों को न्योछावर कर शहीद हो गए उनसे बड़ा कोई पर्यावरणविद नहीं

नोट: जिन्हें सम्मान दिया गया है या दिया जा रहा है उस पर आपत्ति नहीं है , जैसा हम आंकलन कर रहे है वैसा आपने भी मेहनत से, सोच समझकर किया होगा हम उन पर भी हम गर्व करते हैं, लेकिन जो उसके लायक है जब उनके साथ 77 वर्षों से निरंतर अन्याय पूर्ण व्यवहार किया जाता है, तो दुःख नहीं गुस्सा आता है

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