Betul and MP Latest News

सखी समाधान में पुरुष परामर्श दाताओं से तौबा क्यों..?

✓सखी समाधान में पुरुष परामर्श दाताओं से तौबा क्यों..?
✓सेव इंडियन फैमिली ने कहा पुरुष महिलाओं से कैसे कह पाएगा हर बात
परिधि सखी समाधान पार्ट – 2

पूरे प्रदेश में 1997 में वरिष्ठ नागरिक संगठन ने राज्य स्तरीय परिवार परामर्श केंद्र की नींव रखकर मिसाल पेश की थी। परिवार परामर्श केंद्र की अवधारणा वैसे तो सेवा निवृत्त एएसपी के के पांडे की थी,लेकिन इसकी प्रासंगिकता को देखते हुए इसे पूरे प्रदेश में लागू किया गया था।बैतूल में जब परिवार परामर्श केंद्र को प्रारंभ किया गया तो इस बात का ध्यान रखा गया था कि टूटते परिवारों को जोड़ने के लिए बेहद संवेदनशील, उम्रदराज और अनुभवी लोगों को परामर्शदाता नियुक्त किया गया था।परामर्श केंद्र जब बंद हुए तो सभी आहत भी थे,लेकिन वन स्टॉप सेंटर को लेकर सभी आश्वस्त भी थे कि महिला सुरक्षा की दिशा में सरकार ने ठोस कदम उठाया।परिवार परामर्श केंद्र में एक बात का और ध्यान रखा गया था कि महिला परामर्शदाताओं के साथ पुरुष परामर्शदाता भी पारिवारिक कलह को दूर करने के लिए काउंसलिंग में शामिल होते थे।इसके पीछे वजह साफ थी कि जरूरी नहीं है कि हमेशा महिला ही प्रताड़ित हो। पुरुष परामर्शदाता के सामने पति,भाई, पिता अपनी बात बिना संकोच कह पाते थे और समस्या का उचित समाधान भी हो जाता था,लेकिन बैतूल पुलिस द्वारा संचालित सखी समाधान में एक भी पुरुष काउंसलर नहीं है।औपचारिकता के लिए व्हाट्सएप ग्रुप में एक पुरुष पुलिसकर्मी को जरूर जोड़ा गया है लेकिन वह काउंसलर नहीं है।

परिवार के विघटन में महिलाएं भी जिम्मेदार

इस समय परिवारिक विघटन में महिलाओं की भी जिम्मेदारी से नकारा नहीं जा सकता और पुरुष भी अब महिलाओं द्वारा प्रताड़ित करने की शिकायतें करने लगे है। यहां तक कि पुरुषों के लिए अलग आयोग बनाने की भी मांग हो रही है, ऐसे में समानता के अधिकार को दर किनार कर परामर्शदाताओं में सिर्फ महिलाओं को रखने पर सेव इंडियन फैमिली संगठन ने भी आपत्ति जताई है।सेव इंडियन फैमिली संगठन बैतूल के संस्थापक डॉ संदीप गोहे का कहना है कि किसी भी मुद्दे पर दोनों पक्षों की बात सुनी जानी जरूरी है।यदि सामने महिलाएं होगी तो, कई ऐसी बात एक पति जो किसी पुरुष से कहने में सहज हो सकता है वह महिलाओं से नहीं कह पाएगा।इस लिहाज़ से पुलिस का सखी सहायता केंद्र रिश्तों की कसौटी पर भला कैसे खरा उतरेगा।

सखी समाधान में पुरुष परामर्शदाता के न होने SIF ने भी उठाए सवाल

सीआईएफ संस्था के डॉ संदीप गोहे जो कि एक मनोवैज्ञानिक, सामाजिक कार्यकर्ता और पुरुष मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ है, डॉ गोहे
पिछले 12 वर्षों से पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक विवादों, झूठे मामलों और परिवार संरक्षण से जुड़े मुद्दों पर जमीनी स्तर पर कार्य कर रहे है।
वे सेव इंडियन फैमिली दिल्ली के  आंदोलन सेव मोमेंट से संबद्ध होकर बैतूल क्षेत्र में सक्रिय रूप से कार्य कर रहे है पुरुष, महिला और पूरे परिवार के लिए काउंसलिंग और सहायता प्रदान करते है। डॉ गोहे का कहना है कि महिलाओं की सुरक्षा और सहायता के लिए बनाए गए किसी भी मंच का उद्देश्य सराहनीय है।
यदि कोई महिला पीड़ित है, तो उसे हर हाल में सहायता मिलनी चाहिए, लेकिन परिवार केवल महिला से नहीं बनता।
परिवार महिला और पुरुष – दोनों से मिलकर बनता है।
ऐसी किसी भी सहायता या काउंसलिंग व्यवस्था में
यदि बनाए गए ग्रुप या टीम में एक भी पुरुष की भागीदारी नहीं है,
तो यह अपने-आप में एक गंभीर सवाल खड़ा करता है।कई मामलों में पुरुष भी अपनी बात रखना चाहता है,
लेकिन जब सामने केवल महिला प्रतिनिधित्व हो,
तो वह यह समझ नहीं पाता कि वह अपनी बात किससे और कैसे साझा करे।
यह एक व्यवहारिक सच्चाई है कि
कुछ संवेदनशील बातें पुरुष, पुरुष से ही खुलकर साझा कर पाता है,
जो वह महिलाओं के सामने कहने में संकोच करता है।
ऐसे में उसकी बात अधूरी रह जाती है
और समाधान एकतरफा दिशा में चला जाता है। डॉ गोहे ने परिधि न्यूज से चर्चा में बताया कि 12 वर्षों के फील्ड अनुभव में यह भी सामने आया है कि आज झूठे मामलों का चलन एक गंभीर सामाजिक समस्या बन चुका है।
इन मामलों में केवल पुरुष ही नहीं,
बल्कि पूरा परिवार 
माँ, बहनें, पत्नी और बेटियाँ 
मानसिक, सामाजिक और आर्थिक दबाव में आ जाती हैं।इसी कारण सीआईएफ बैतूल
केवल पीड़ित पुरुष की नहीं, उसके पूरे परिवार की सहायता करती है,
जिसमें परिवार की महिलाएँ भी बराबरी से शामिल रहती हैं।उनका कहना है कि समझौता तभी न्यायपूर्ण होता है, जब दोनों पक्षों को सुना जाए।यदि किसी सहायता प्रणाली में
पुरुष की बात सुने बिना ही निष्कर्ष निकाल लिया जाए,
तो वह सहायता नहीं बल्कि जेंडर-बायस बन जाती है। डॉ गोहे का कहना है कि हम किसी महिला सहायता डेस्क के विरोध में नहीं हैं,लेकिन यह स्पष्ट रूप से कहना ज़रूरी है कि
सहायता और काउंसलिंग की प्रक्रिया जेंडर-बायस से मुक्त होनी चाहिए।महिला और पुरुष  दोनों की उपस्थिति और सुनवाई
तभी वास्तविक संतुलन और समाधान ला सकती है।जब सहायता समूह में एक भी पुरुष नहीं होगा,
तो पुरुष अपनी बात आखिर किससे कहेगा?
परिवार और समाज का संतुलन
तभी बनेगा जब सहायता व्यवस्था जेंडर नहीं,
इंसान को केंद्र में रखे।

एसआईएफ बैतूल को जाने

सेव इंडियन फैमिली बैतूल एनजीओ के संबंध में डॉक्टर गोहे  ने बताया कि SIF का उद्देश्य किसी एक जेंडर के पक्ष में खड़ा होना नहीं,
बल्कि परिवार, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक संतुलन की रक्षा करना है।
हमारे कार्य में पीड़ित पुरुष उसकी पत्नी उसकी माँ, बहनें, बेटियाँ और पूरा परिवार सभी शामिल होते हैं, क्योंकि हमारा मानना है कि
परिवार बचेगा तभी समाज बचेगा।

You might also like
Leave A Reply

Your email address will not be published.